भारत में गहराया इंवॉयरमेंटल क्राइसिस: 2025 में मौसमी आपदाओं से 4,421 लोगों की मौत, CSE रिपोर्ट ने दी गंभीर चेतावनी

0
images (1)

CENTRAL NEWS DESK(अवनीश मिश्रा): वर्ल्ड इंवॉयरमेंटल डे (5 जून) से ठीक पहले जारी हुई एक नई रिपोर्ट ने भारत में पर्यावरण, जलवायु और जनस्वास्थ्य की बिगड़ती स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 इन फिगर्स’ के अनुसार देश जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल संकट और वन क्षरण जैसी चुनौतियों का तेजी से सामना कर रहा है। रिपोर्ट सरकारी आंकड़ों पर आधारित है और इसमें बताया गया है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है।

साल के 99 परसेंट दिनों में दर्ज हुआ चरम मौसम

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने किसी न किसी रूप में असामान्य और चरम मौसम का सामना किया। सीएसई की प्रोग्राम डायरेक्टर किरण पांडे के मुताबिक, पूरे साल के 99 प्रतिशत दिनों में देश के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं। इन आपदाओं के कारण 4,421 लोगों की जान चली गई, जबकि 1.74 करोड़ हेक्टेयर से अधिक फसलें प्रभावित हुईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मार्च और अप्रैल अब किसानों के लिए सबसे जोखिम भरे महीने बनते जा रहे हैं।

सर्दियों के मौसम में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। इतिहास में पहली बार फरवरी 2026 में एक भी शीत लहर दर्ज नहीं हुई। इसके विपरीत मार्च की शुरुआत में ही हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में भीषण लू का सामना करना पड़ा।

वायु प्रदूषण बना जानलेवा खतरा

रिपोर्ट के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण का असर लगातार गंभीर होता जा रहा है। वर्ष 2014 में दुनिया भर में प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों में भारत की हिस्सेदारी 23.76 प्रतिशत थी, जो 2023 में बढ़कर 25.34 प्रतिशत हो गई। जहां वैश्विक स्तर पर प्रदूषण से मृत्यु दर प्रति एक लाख लोगों पर 114 है, वहीं भारत में यह आंकड़ा 186 तक पहुंच चुका है। पिछले एक दशक में बाहरी हवा में मौजूद पीएम 2.5 कणों के कारण होने वाली मौतों में 61 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि घरेलू प्रदूषण, जैसे चूल्हे के धुएं से होने वाली मौतों में 22 प्रतिशत की कमी आई है। विशेषज्ञ इसका श्रेय एलपीजी जैसे स्वच्छ ईंधन के बढ़ते उपयोग को देते हैं।

जल संकट की ओर बढ़ रहा भारत

संयुक्त राष्ट्र यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ ने चेतावनी दी है कि दुनिया अब “ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी” यानी वैश्विक जल दिवालियापन की स्थिति की ओर बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कई प्रमुख नदी डेल्टा अत्यधिक भूजल दोहन के कारण धीरे-धीरे धंस रहे हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में जितना भूजल प्राकृतिक रूप से पुनर्भरित हो रहा है, उससे कहीं अधिक मात्रा में पानी निकाला जा रहा है। इससे भविष्य में गंभीर जल संकट पैदा होने की आशंका बढ़ गई है।

युवाओं में बढ़ रहा हृदय रोग का खतरा

नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस के अप्रैल 2026 के आंकड़ों के अनुसार देश की लगभग 13 प्रतिशत आबादी किसी न किसी बीमारी से पीड़ित है। पिछले तीन दशकों में बीमार लोगों की संख्या दोगुनी हो चुकी है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अब हृदय रोग कम उम्र के युवाओं को भी प्रभावित कर रहे हैं। 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में दर्ज बीमारियों में लगभग 2 प्रतिशत हिस्सेदारी हृदय रोगों की है। रिपोर्ट के अनुसार बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण 30,600 से अधिक लोगों ने आत्महत्या तक कर ली।

जंगलों पर बढ़ा दबाव, बढ़े मानव-वन्यजीव संघर्ष

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच गैर-वानिकी गतिविधियों जैसे सड़क, उद्योग और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए लगभग 97,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र को मंजूरी दी गई। वन क्षेत्रों में कमी के कारण मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2025 के शुरुआती छह महीनों में ही बाघों के हमलों में 40 लोगों की मौत दर्ज की गई। इसके साथ ही पर्यावरण से जुड़े मामलों का न्यायिक बोझ भी बढ़ रहा है। वर्ष के अंत तक देश की अदालतों में 99,000 से अधिक पर्यावरण संबंधी मामले लंबित थे।

डेटा के आधार पर बदलाव की जरूरत

रिपोर्ट जारी करते हुए सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि किसी भी बदलाव की शुरुआत सटीक आंकड़ों से होती है। उन्होंने कहा कि जिसे मापा जाता है, उसी पर प्रभावी कार्रवाई संभव होती है और इसलिए पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा सबसे महत्वपूर्ण आधार है।

भविष्य के लिए चेतावनी

रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि भारत जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के एक गंभीर दौर से गुजर रहा है। यदि अभी से ठोस नीतियां और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय और मानवीय संकट और अधिक गहरा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed