सड़क से स्कूल तक: सरकारी आंकड़ों ने खोली पढ़ाई की कड़वी तस्वीर, बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़कों पर बच्चे

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CENTRAL NEWS DESK: देश के अलग-अलग हिस्सों में स्कूली बच्चों के प्रदर्शन अब केवल किसी एक स्कूल या स्थानीय समस्या तक सीमित नहीं दिख रहे हैं। कहीं बच्चे स्कूल तक पक्की सड़क की मांग को लेकर पैदल मार्च कर रहे हैं, तो कहीं छात्राएं शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज उठा रही हैं। इन प्रदर्शनों के बीच UDISE+ के सरकारी आंकड़े देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में मौजूद कई गंभीर कमियों की तस्वीर सामने रखते हैं।

हमीरपुर में 6 किलोमीटर पैदल चले करीब 300 बच्चे

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में करीब 300 बच्चों ने अपने स्कूल तक पक्की सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट तक करीब 6 किलोमीटर का पैदल मार्च निकाला। बच्चों की मांग स्कूल तक सुरक्षित और बेहतर रास्ता उपलब्ध कराने की थी। लखनऊ में करीब 250 छात्राओं ने शिक्षकों की भारी कमी और स्कूल में बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर प्रदर्शन किया। वहीं, जयपुर में दिव्यांग छात्रों ने सफाई व्यवस्था, जर्जर क्लासरूम और दिव्यांग-अनुकूल शौचालयों की कमी का मुद्दा उठाया। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि जब बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल तक पहुंचने से लेकर शौचालय और शिक्षक जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए आवाज उठानी पड़े, तो शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति क्या है?

1 लाख से ज्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे

UDISE+ के आंकड़े इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं। देश में कुल 14,66,682 स्कूल हैं। इनमें करीब 68.4 प्रतिशत स्कूल राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। इन स्कूलों में 29 लाख से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं। कर्नाटक में अकेले 8,042 स्कूल ऐसे हैं जो एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और शिक्षक-छात्र अनुपात पर पड़ सकता है।

दूसरी तरफ 5,663 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं

शिक्षा व्यवस्था की दूसरी तस्वीर भी कम चौंकाने वाली नहीं है। देश के 5,663 स्कूलों में एक भी छात्र नामांकित नहीं है, लेकिन इन स्कूलों में कुल 20,667 शिक्षक तैनात हैं। एक तरफ लाखों बच्चे कम शिक्षकों वाले स्कूलों में पढ़ रहे हैं और दूसरी तरफ कई स्कूलों में छात्र नहीं होने के बावजूद शिक्षक तैनात हैं। यह आंकड़ा संसाधनों के असमान वितरण पर सवाल खड़ा करता है।

डिजिटल शिक्षा में भी बड़ा अंतर

स्कूलों में डिजिटल सुविधाओं की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। देश के केवल 67.4 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट उपलब्ध है, जबकि 63.1 प्रतिशत स्कूलों में चालू कंप्यूटर हैं। डिजिटल लाइब्रेरी की स्थिति इससे भी कमजोर है। देश के सिर्फ 7.1 प्रतिशत स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी उपलब्ध है। तमिलनाडु इसका दिलचस्प उदाहरण है। राज्य में स्कूलों का इंटरनेट कवरेज करीब 99 प्रतिशत बताया गया है, लेकिन सरकारी स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी की उपलब्धता सिर्फ 0.8 प्रतिशत है। यानी इंटरनेट पहुंचने के बावजूद डिजिटल शिक्षा की पूरी व्यवस्था हर स्कूल तक नहीं पहुंच पाई है।

दिव्यांग बच्चों के लिए भी बड़ी कमी

दिव्यांग छात्रों के लिए स्कूलों में जरूरी सुविधाओं की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। आंकड़ों के अनुसार केवल 40.1 प्रतिशत स्कूलों में CWSN यानी दिव्यांग-अनुकूल शौचालय हैं। हालांकि, 79.7 प्रतिशत स्कूलों में रैंप उपलब्ध हैं। इसका मतलब यह है कि स्कूलों तक पहुंच आसान बनाने के लिए कुछ बुनियादी ढांचा मौजूद है, लेकिन दिव्यांग बच्चों की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए सुविधाएं अभी भी काफी पीछे हैं।

प्राइवेट स्कूल डिजिटल सुविधाओं में आगे

सरकारी और निजी स्कूलों की तुलना करने पर भी अंतर दिखाई देता है। इंटरनेट और चालू कंप्यूटर जैसी डिजिटल सुविधाओं में निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल आगे हैं। वहीं, रैंप और हैंडरेल जैसी भौतिक पहुंच से जुड़ी सुविधाओं में सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहतर बताई गई है। लड़कियों के लिए चालू शौचालय की उपलब्धता दोनों तरह के स्कूलों में 95 प्रतिशत से अधिक है। इससे साफ है कि सरकारी और निजी स्कूलों की ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में

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