दुनिया के लिए नया रोडमैप: कम काम, ज्यादा इनकम और कंट्रोल होगा क्लाइमेट क्राइसिस

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दुनिया के लिए नया रोडमैप: कम काम, ज्यादा इनकम और कंट्रोल होगा क्लाइमेट क्राइसिस

CENTRAL NEWS DESK (Avneesh mishra): दुनिया इस समय तीन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है बढ़ती इकोनॉमिकल इनइक्वालिटी,जलवायु परिवर्तन और रिसोर्सेस पर बढ़ता प्रेशर। ऐसे में एक नई इंटरनेशनल ने 21वीं सदी के लास्ट तक दुनिया को बदलने वाला एक रिपोर्ट पेश की है। ‘ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट’ के अनुसार अगर गवर्नमेंट, इंटरेनशनल इंस्टिट्यूशन्स और समाज मिलकर बड़े आर्थिक और इंवायरमेंटल सुधार लागू करें,तो 2100 तक दुनिया की 90 परसेंट पॉपुलेशन की इंनकम डबल हो सकती है. इतना ही नहीं, लोगों को आज की तुलना में आधे घंटे काम करना पड़ेगा और धरती भी रहने योग्य बनी रह सकती है।

रिपोर्ट का सबसे बड़ा दावा
रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के अधिकांश लोगों को बेहतर जीवन स्तर देने और जलवायु संकट से निपटने के टारगेट एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सही पॉलिसी के जरिए दोनों टारगेट एक साथ हासिल किए जा सकते हैं। रिसर्चर का अनुमान है कि 2100 तक वर्ल्ड के विभिन्न देशों के बीच इनकम का अंतर काफी कम हो जाएगा। आज जहां सबसे गरीब और सबसे अमीर क्षेत्रों की औसत इनकम में करीब 16 गुना का डिफरेंस है, वहीं सदी के लास्ट तक यह अंतर काफी हद तक सिमट सकता है।

लोगों को करना पड़ेगा कम काम
रिपोर्ट के मुताबिक तकनीकी प्रगति और प्रोडक्शन बढ़ने से लोगों के काम के घंटे धीरे-धीरे कम किए जा सकते हैं। प्रेजेंट टाइम में एक वर्कर औसतन साल में लगभग 2100 घंटे काम करता है। 2100 तक यह घटकर करीब 1000 घंटे रह सकता है। बचे हुए समय का बड़ा हिस्सा एजुकेशन, हेल्थ, फेमिली और सोशल एक्टिविटी में लगाया जा सकेगा। रिपोर्ट का मानना है कि बेहतर लाइफ केवल आय बढ़ने से नहीं बल्कि जीवन की क्वालिटी बेस्ट होने से भी तय होता है।

अमीर-गरीब की कमाई हो सकती है कम
आज दुनिया की आधी पॉपुलेशन के पास ग्लोबल इनकम का सिर्फ 2 परसेंट ही हिस्सा है। रिपोर्ट का टारगेट है कि 2100 तक यह हिस्सा बढ़कर 30 परसेंट तक पहुंच जाए। वहीं, बिलेनियर के पास मौजूद ग्लोबल इनकम का हिस्सा मौजूदा 6 परसेंट से घटकर 0.05 परसेंट रह सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इनकम और प्रॉपर्टी में असमानता कम किए बिना स्टेबल डिवलपमेंट संभव नहीं है।

जलवायु संकट से कैसे बचेगी दुनिया
रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए एनर्जी फील्ड में तेज बदलाव, जीवाश्म ईंधन पर डिपेंडेंसी कम करना और जरूरत से ज्यादा उपभोग के कल्चर को बदलना होगा। रिसर्चर का अनुमान है कि यदि दुनिया तेजी से क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ती है और संसाधनों का संतुलित उपयोग करती है,तो ग्लोबल टेम्प्रेचर के ग्रोथ को 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सकता है। इस समय यह ग्रोथ 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो सकती है।

विमेंस और मेंस के बीच बराबरी पर भी जोर
रिपोर्ट केवल आर्थिक बदलाव की बात नहीं करती, बल्कि सोशल इक्वालिटी को भी अहम मानती है। इसमें विमेंस और मेंस के लिए एक जैसी सैलरी, घरेलू जिम्मेदारियों में बराबर भागीदारी और एजुकेशन व हेल्थ तक समान पहुंच की वकालत की गई है। रिपोर्ट में एक ग्लोबल न्याय कोष बनाने का सुझाव दिया गया है। यह कोष दुनिया भर में विकास परियोजनाओं और निवेश के लिए इस्तेमाल होगा। इसके लिए अरबपतियों पर ग्लोबल प्रॉपर्टी टैक्स, सबसे ज्यादा इनकम करने वालों पर हाई टैक्स रेट और इंटरनेशनल फाइनेशियल सुधार जैसे कदम सुझाए गए हैं। रिपोर्ट का मानना हैं कि यह टारगेट कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। उनका तर्क है कि इतिहास में भी ऐसे कई बड़े चेंजमेंट हुए हैं जिन्हें कभी असंभव माना जाता था। सार्वभौमिक मतदान अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और काम के घंटों में कमी इसके उदाहरण हैं। हालांकि इस विजन को साकार करने के लिए दुनिया भर की सरकारों को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी और इंटरनेशनल लेवल पर सहयोग बढ़ाना होगा।

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