जेम्स वेब टेलीस्कोप ने सुलझाई ब्रह्मांड की बड़ी पहेली, रहस्यमयी ‘लिटल रेड डॉट्स’ निकले सुपरमैसिव ब्लैक होल

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CENTRAL NEWS DESK: ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में दिखाई देने वाले रहस्यमयी “लिटल रेड डॉट्स” यानी छोटे लाल बिंदु पिछले कई वर्षों से वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी पहेली बने हुए थे। साल 2022 में जब जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने पहली बार गहरे अंतरिक्ष की तस्वीरें और डेटा भेजना शुरू किया, तब इन अजीबोगरीब ऑब्जेक्ट्स की पहचान हुई थी। ये छोटे लेकिन बेहद चमकदार लाल बिंदु बिग बैंग के लगभग 60 करोड़ साल बाद बड़ी संख्या में दिखाई दिए थे। हालांकि सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि ब्रह्मांड की उम्र करीब 2 अरब साल होने से पहले ही ये लगभग गायब हो जाते थे। आखिर ये क्या थे और कहां चले जाते थे, इसका जवाब वैज्ञानिकों को नहीं मिल रहा था।

GLIMPSE-17775 ने दिया सबसे बड़ा सुराग

अब यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के वैज्ञानिक वासिली कोकोरेव और उनकी टीम ने इस रहस्य को सुलझाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। उनकी नई रिसर्च में GLIMPSE-17775 नामक एक लिटल रेड डॉट का विस्तृत अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन बताता है कि ये रहस्यमयी ऑब्जेक्ट दरअसल तेजी से विकसित हो रहे सुपरमैसिव ब्लैक होल हो सकते हैं, जो गैस और धूल के बेहद घने आवरण में छिपे हुए हैं।

जब वैज्ञानिकों ने GLIMPSE-17775 के स्पेक्ट्रम का विश्लेषण किया तो उन्हें 40 से अधिक महत्वपूर्ण स्पेक्ट्रल लाइन्स मिलीं। स्पेक्ट्रम किसी भी खगोलीय पिंड की पहचान का सबसे अहम माध्यम माना जाता है। इन लाइन्स में हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम और आयरन जैसे तत्वों के संकेत मिले। शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा था कि यह कोई साधारण गैलेक्सी हो सकती है, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर पता चला कि इसके भीतर एक अत्यधिक शक्तिशाली ऊर्जा स्रोत मौजूद है।

सुपरमैसिव ब्लैक होल के मिले मजबूत सबूत

रिसर्च के अनुसार GLIMPSE-17775 के केंद्र में एक तेजी से बढ़ता हुआ सुपरमैसिव ब्लैक होल मौजूद है। सुपरमैसिव ब्लैक होल वे ब्लैक होल होते हैं जिनका द्रव्यमान हमारे सूर्य से लाखों या अरबों गुना अधिक हो सकता है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह था कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में इतने विशाल ब्लैक होल इतनी जल्दी कैसे बन गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये ब्लैक होल अपने आसपास मौजूद गैस और धूल को बेहद तेज गति से निगल रहे थे। इसी कारण उनका विकास सामान्य ब्लैक होल की तुलना में कहीं अधिक तेजी से हुआ। यही वजह है कि शुरुआती ब्रह्मांड में भी इतने विशाल ब्लैक होल मौजूद दिखाई दे रहे हैं।

गैस के कोकून में छिपा है पूरा रहस्य

इस रिसर्च की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह रही कि ब्लैक होल पूरी तरह खुला नहीं है। इसके चारों ओर गैस और धूल का एक घना आवरण मौजूद है, जिसे वैज्ञानिक “गैस कोकून” कह रहे हैं। यह गैसीय आवरण ब्लैक होल से निकलने वाली रोशनी को बदल देता है। परिणामस्वरूप यह ऑब्जेक्ट दूर से देखने पर एक छोटे लाल बिंदु की तरह दिखाई देता है। वास्तव में वैज्ञानिक ब्लैक होल को सीधे नहीं देख रहे होते, बल्कि उसके आसपास मौजूद गैस से निकलने वाली परिवर्तित रोशनी को देख रहे होते हैं।

आखिर कहां गायब हो जाते हैं लिटल रेड डॉट्स?

यह इस पूरी खोज का सबसे अहम सवाल था। वैज्ञानिकों के अनुसार लिटल रेड डॉट्स वास्तव में कहीं गायब नहीं होते। समय के साथ ब्लैक होल अपने आसपास मौजूद गैस और धूल को साफ कर देता है। जब यह घना आवरण हट जाता है तो वही ऑब्जेक्ट एक सामान्य एक्टिव गैलेक्सी की तरह दिखाई देने लगता है।

यानी जो ऑब्जेक्ट पहले “लिटल रेड डॉट” दिखाई देता था, बाद में उसका स्वरूप बदल जाता है। इसी वजह से वैज्ञानिकों को लगता था कि ये रहस्यमयी ऑब्जेक्ट अचानक गायब हो गए हैं।

आइंस्टीन की थ्योरी ने निभाई बड़ी भूमिका

इस खोज में अल्बर्ट आइंस्टीन की लगभग 100 साल पुरानी जनरल रिलेटिविटी थ्योरी ने भी अहम योगदान दिया है। GLIMPSE-17775 एक विशाल गैलेक्सी क्लस्टर के पीछे स्थित था। ऐसे में उस क्लस्टर के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ने उसकी रोशनी को मोड़ दिया। इस प्रक्रिया को ग्रेविटेशनल लेंसिंग कहा जाता है। इसके कारण पीछे मौजूद ऑब्जेक्ट वास्तविक आकार से कहीं अधिक बड़ा और चमकदार दिखाई देता है। वैज्ञानिक इसे प्रकृति का मैग्निफाइंग ग्लास भी कहते हैं। इसी प्रभाव के कारण जेम्स वेब टेलीस्कोप को GLIMPSE-17775 का बेहद स्पष्ट और विस्तृत डेटा प्राप्त हुआ।

एक्स-रे टेलीस्कोप क्यों नहीं पकड़ पाए इनका राज?

लंबे समय से वैज्ञानिक इस बात को लेकर भी उलझन में थे कि अधिकांश लिटल रेड डॉट्स एक्स-रे ऑब्जर्वेशन में दिखाई क्यों नहीं देते। नई स्टडी के अनुसार इसका कारण भी वही घना गैसीय आवरण है। ब्लैक होल से निकलने वाली हाई-एनर्जी एक्स-रे किरणें इस गैस में फंस जाती हैं और बाहर नहीं निकल पातीं। इसलिए एक्स-रे टेलीस्कोप को इनका स्पष्ट संकेत नहीं मिल पाता। यही वजह है कि इनकी असली पहचान इतने लंबे समय तक छिपी रही।

‘आयरन फॉरेस्ट’ ने मजबूत किया ब्लैक होल सिद्धांत

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने आयरन की 16 अलग-अलग स्पेक्ट्रल लाइन्स की पहचान की। इन लाइन्स के समूह को “आयरन फॉरेस्ट” नाम दिया गया है। इतनी बड़ी संख्या में आयरन लाइन्स का मिलना इस बात का संकेत है कि वहां अत्यधिक ऊर्जा वाला वातावरण मौजूद है। ऐसा वातावरण केवल तेजी से बढ़ते हुए सुपरमैसिव ब्लैक होल के आसपास ही बन सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब पहले से कहीं ज्यादा भरोसे के साथ कह रहे हैं कि लिटल रेड डॉट्स वास्तव में ब्लैक होल के शुरुआती रूप हैं।

ब्रह्मांड के इतिहास को समझने में मिलेगी मदद

यह खोज केवल एक रहस्य सुलझाने तक सीमित नहीं है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि बिग बैंग के बाद पहली गैलेक्सियां कैसे बनीं, सुपरमैसिव ब्लैक होल इतने कम समय में कैसे विकसित हुए और ब्रह्मांड का शुरुआती विकास वास्तव में किस तरह हुआ।

लंबे समय से वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब खोज रहे थे कि शुरुआती ब्रह्मांड में इतनी विशाल संरचनाएं कैसे विकसित हो गईं। अब लिटल रेड डॉट्स की पहचान इस पहेली को सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।

जेम्स वेब टेलीस्कोप ने बदल दी अंतरिक्ष विज्ञान की तस्वीर

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को मानव इतिहास का सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष टेलीस्कोप माना जाता है। इसकी उन्नत इंफ्रारेड तकनीक अरबों साल पुरानी रोशनी को भी पहचान सकती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक आज ब्रह्मांड के उस दौर को देख पा रहे हैं, जो पहले पूरी तरह रहस्य बना हुआ था। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जेम्स वेब टेलीस्कोप की मदद से ऐसे कई और रहस्य सामने आएंगे, जो हमारी ब्रह्मांड संबंधी समझ को पूरी तरह बदल सकते हैं।

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