BRICS Summit 2026: डॉलर पर निर्भरता घटाने से लेकर चीन के ट्रेड घाटे तक, भारत के एजेंडे में कई बड़े मुद्दे
भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में इस बार सिर्फ वैश्विक राजनीति ही नहीं, बल्कि व्यापार, टेक्नोलॉजी और आर्थिक सहयोग से जुड़े कई अहम मुद्दे केंद्र में रहने वाले हैं। खास तौर पर चीन के साथ लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना, भारतीय उत्पादों के लिए विदेशी बाजारों में पहुंच आसान बनाना और सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।
इसके अलावा रेयर अर्थ मिनरल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजनेस वीजा, गैर-टैरिफ बाधाओं और डिजिटल पेमेंट सिस्टम जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। भारत BRICS देशों के बीच UPI जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था की कनेक्टिविटी बढ़ाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर तथा एडवांस्ड कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग मजबूत करने पर भी जोर दे सकता है।
चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा बड़ी चुनौती
भारत और चीन के बीच व्यापारिक असंतुलन लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर रहा। चालू वित्त वर्ष में जुलाई तक भी यह करीब 45 अरब डॉलर पहुंच चुका है।
BRICS देशों के साथ भारत का कुल गुड्स ट्रेड भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2021 में जहां यह करीब 203.1 अरब डॉलर था, वहीं वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर लगभग 417.5 अरब डॉलर हो गया। हालांकि व्यापार बढ़ने के साथ भारत का घाटा भी बढ़ा है। BRICS देशों के साथ भारत का ट्रेड डेफिसिट करीब तीन गुना बढ़कर 226.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
यही वजह है कि भारत अब BRICS मंच के जरिए मार्केट एक्सेस बढ़ाने और भारतीय निर्यात को गति देने पर जोर दे सकता है।
चीन से निर्यात में बाधाएं हटाने की कोशिश
भारतीय उद्योग जगत की नजर चीन से जुड़ी उन व्यापारिक बाधाओं पर भी है, जिनका असर भारतीय कंपनियों पर पड़ रहा है। रेयर अर्थ मिनरल्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और इलेक्ट्रिकल उपकरणों से जुड़े निर्यात प्रतिबंधों का मुद्दा अहम हो सकता है।
रेयर अर्थ मिनरल्स आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और कई हाई-टेक उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इनकी आपूर्ति में किसी तरह की बाधा भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी सेक्टर पर असर डाल सकती है।
इसके साथ ही भारतीय कारोबारियों की ओर से चीन में बिजनेस वीजा मिलने में देरी और गैर-टैरिफ बाधाओं को लेकर भी चिंता जताई जाती रही है। भारत की कोशिश होगी कि बातचीत के जरिए इन अड़चनों को कम किया जाए और भारतीय उत्पादों के लिए चीनी बाजार में रास्ता आसान बने।
क्या डॉलर की जगह लोकल करेंसी में होगा कारोबार?
BRICS के आर्थिक एजेंडे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। भारत का जोर पूरी तरह डॉलर को हटाने के बजाय द्विपक्षीय व्यापार में रुपये और संबंधित देश की स्थानीय मुद्रा के इस्तेमाल को बढ़ाने पर रह सकता है।
इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सकती है और देशों के बीच सीधे भुगतान को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS देशों के बीच साझा मुद्रा या एक समान मौद्रिक व्यवस्था की राह अभी काफी मुश्किल है।
BRICS के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं, मौद्रिक नीतियों और वित्तीय व्यवस्थाओं में काफी अंतर है। ऐसे में तत्काल किसी कॉमन करेंसी की संभावना के बजाय स्थानीय मुद्रा में व्यापार और भुगतान व्यवस्था को मजबूत करना ज्यादा व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।
UPI कनेक्टिविटी पर भारत का जोर
भारत अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भी BRICS सहयोग का अहम हिस्सा बनाने की कोशिश कर सकता है। UPI को दूसरे सदस्य देशों के डिजिटल पेमेंट नेटवर्क से जोड़कर तेज और आसान सीमा-पार भुगतान व्यवस्था विकसित करने की दिशा में पहल संभव है।
अगर अलग-अलग देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ते हैं तो कारोबारियों और आम यात्रियों के लिए अंतरराष्ट्रीय भुगतान आसान हो सकता है। इससे छोटे कारोबारियों और डिजिटल कॉमर्स को भी फायदा मिलने की संभावना है।
AI और सेमीकंडक्टर पर बढ़ेगा सहयोग
व्यापार के साथ टेक्नोलॉजी भी भारत के एजेंडे में अहम स्थान रखेगी। भारत BRICS देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और डीप टेक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठा सकता है।
भारतीय स्टार्टअप्स और रिसर्च संस्थानों को BRICS देशों के साथ जोड़ने, टेक्नोलॉजी साझेदारी बढ़ाने और नई तकनीकों में निवेश को प्रोत्साहित करने पर भी चर्चा हो सकती है।
एक्सपर्ट्स की राय
FIEO के DG डॉ. अजय सहाय के मुताबिक भारतीय निर्यातकों की प्रमुख मांग है कि चीनी बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए रास्ता आसान हो। गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने और बिजनेस वीजा की प्रक्रिया को सरल बनाने से दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन को कम करने में मदद मिल सकती है।
GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव का मानना है कि BRICS के भीतर चीन का व्यापारिक दबदबा काफी बड़ा है और भारत को चीन के साथ-साथ रूस और इंडोनेशिया जैसे बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार हाई-वैल्यू एक्सपोर्ट बढ़ाना और कुछ चुनिंदा सप्लायर्स पर निर्भरता कम करना जरूरी है।
वहीं इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. मनोरंजन शर्मा ने स्थानीय मुद्रा में व्यापार और CBDC इंटरऑपरेबिलिटी को लेकर बढ़ती चर्चा की ओर इशारा किया। हालांकि उनके मुताबिक भारत को केवल डॉलर से दूरी बनाने के बजाय अपने विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक जोखिमों के बेहतर प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए।
भारत के सामने असली चुनौती क्या?
BRICS के जरिए व्यापार बढ़ाने की संभावनाएं काफी बड़ी हैं, लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती निर्यात बढ़ाकर व्यापार घाटे को नियंत्रित करना होगी। केवल आयात बढ़ने से BRICS के साथ व्यापार का आकार तो बढ़ेगा, लेकिन भारत का घाटा भी बढ़ सकता है।
इसलिए भारत की रणनीति में एक तरफ लोकल करेंसी और डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने की कोशिश होगी, तो दूसरी तरफ भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार खोलने और हाई-टेक निर्यात बढ़ाने पर जोर रहेगा।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
