BRICS SUMMIT 2026: युद्ध की आग, डॉलर का दबदबा और चीन से तनाव… दिल्ली में BRICS की अग्निपरीक्षा
CENTRAL NEWS DESK: भारत की राजधानी नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी में हो रहे इस दो दिवसीय सम्मेलन में दुनिया के कई प्रमुख नेता हिस्सा ले रहे हैं। शहर को ब्रिक्स की थीम वाले पोस्टरों, रोशनी और सजावट से सजाया गया है। सम्मेलन को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी की गई है और करीब 30 हजार अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है।
सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया कई बड़े संकटों से गुजर रही है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और वैश्विक व्यापार से जुड़ी चुनौतियां ब्रिक्स देशों के सामने हैं। इसके साथ ही समूह के भीतर भी ईरान-यूएई तनाव, यमन संघर्ष और भारत-चीन मतभेद जैसे मुद्दे मौजूद हैं।
सात साल बाद भारत पहुंचे शी जिनपिंग
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस समेत कई प्रमुख नेता शुक्रवार को नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। इन नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शुरुआती द्विपक्षीय बैठकों में हिस्सा लिया।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा इस सम्मेलन की सबसे अहम घटनाओं में से एक माना जा रहा है। वह करीब सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। भारत और चीन के बीच 2020 के सीमा विवाद के बाद रिश्तों में तनाव रहा है, हालांकि हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच संवाद और संबंध सुधारने की कोशिशें हुई हैं।
ऐसे में मोदी-जिनपिंग मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है। माना जा रहा है कि दोनों नेता सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा कर सकते हैं।
क्या है ब्रिक्स?
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। वर्ष 2006 में समूह का गठन हुआ और 2009 में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका 2010 में इसमें शामिल हुआ और समूह का नाम ब्रिक्स हो गया।
2023 में समूह के विस्तार का फैसला हुआ। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। इंडोनेशिया 2025 में समूह का सदस्य बना।
वर्तमान में ब्रिक्स में 11 सदस्य देश हैं। समूह में दुनिया की करीब 49 प्रतिशत आबादी रहती है और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत बताई जाती है।
ब्रिक्स का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाना तथा वैश्विक संस्थाओं में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका मजबूत करना है।
इस बार सम्मेलन का मुख्य विषय क्या है?
भारत की मेजबानी में हो रहे इस सम्मेलन की थीम “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” रखी गई है। सम्मेलन में आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, व्यापार और सीमा पार भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान रहने की उम्मीद है।
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना कर रहे रूस और ईरान के लिए सीमा पार भुगतान की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। रूस की ओर से ब्रिक्स देशों के साथ डिजिटल मुद्रा के माध्यम से व्यापारिक भुगतान की संभावनाओं पर चर्चा किए जाने की बात कही गई है।
डॉलर की जगह दूसरी मुद्रा पर कितना जोर?
ब्रिक्स देशों में लंबे समय से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और सीमा पार भुगतान को आसान बनाने पर चर्चा होती रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल डॉलर को पूरी तरह हटाना व्यावहारिक नहीं है।
ब्रिक्स के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं, वित्तीय प्रणालियों और नीतियों में काफी अंतर है। इसलिए समूह के भीतर साझा भुगतान व्यवस्था बनाने की कोशिश हो सकती है, लेकिन एक ही मुद्रा को डॉलर के विकल्प के रूप में स्थापित करना आसान नहीं होगा।
फिर भी डिजिटल मुद्रा, स्थानीय मुद्राओं और नए भुगतान माध्यमों पर सहयोग से सदस्य देशों को प्रतिबंधों, व्यापार बाधाओं और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली परेशानियों से निपटने में मदद मिल सकती है।
ईरान युद्ध भी रहेगा बड़ा मुद्दा
अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध का असर ब्रिक्स सम्मेलन पर भी दिखाई दे सकता है। ईरान ब्रिक्स का सदस्य है और इस संघर्ष ने ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित किया है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। यह भारत की उनकी पहली यात्रा है। ऐसे में ईरान के साथ भारत के संबंध और क्षेत्रीय स्थिरता भी चर्चा के केंद्र में रह सकती है।
हालांकि ब्रिक्स के भीतर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद हैं। ऐसे में सभी सदस्य देशों के लिए युद्ध पर एक जैसी भाषा पर सहमत होना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यमन संकट से भी बढ़ी मुश्किल
ब्रिक्स के भीतर ईरान और सऊदी अरब के बीच भी क्षेत्रीय तनाव का असर पड़ रहा है। ईरान समर्थित हूती संगठन और सऊदी अरब से जुड़े पक्षों के बीच यमन में संघर्ष जारी है। यमन और लाल सागर क्षेत्र में अस्थिरता का सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार मार्गों पर पड़ सकता है। इसलिए ब्रिक्स सम्मेलन में क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय बन सकती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी होगी चर्चा
ब्रिक्स में रूस एक प्रमुख सदस्य है, इसलिए रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ा मुद्दा भी सम्मेलन से बाहर नहीं रह सकता। हालांकि ब्रिक्स देशों के इस युद्ध को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। पिछले शिखर सम्मेलन में भी समूह ने रूस की सीधे आलोचना करने से परहेज किया था। इस बार भी सदस्य देश ऐसी भाषा पर सहमति बनाने की कोशिश कर सकते हैं जिसमें किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन या विरोध करने के बजाय संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सभी देशों के वैध हितों की बात की जाए।
अमेरिका की ओर से रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के प्रयासों के बीच इस मुद्दे पर ब्रिक्स की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत-चीन तनाव ब्रिक्स के लिए बड़ी चुनौती
भारत और चीन के संबंधों में सुधार की कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास कायम है। 2020 के सीमा संघर्ष के बाद संबंधों में तनाव बढ़ा था। सीमा विवाद के अलावा भारत का चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। दोनों देश ब्रिक्स के सदस्य हैं, लेकिन वैश्विक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था को लेकर उनकी प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं।
चीन ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के रूप में देखता है, जबकि भारत इसे रणनीतिक स्वायत्तता और नए साझेदार बनाने के मंच के तौर पर देखता है। भारत ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी गठबंधन के रूप में पेश करने के बजाय गैर-पश्चिमी लेकिन गैर-पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में देखता है।
क्या ब्रिक्स पश्चिम के लिए चुनौती बन रहा है?
ब्रिक्स के विस्तार और बढ़ती आर्थिक ताकत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों का ध्यान खींचा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी ब्रिक्स को अमेरिकी आर्थिक हितों के लिए चुनौती के रूप में देख चुके हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स अभी कोई नाटो या यूरोपीय संघ जैसा एकजुट राजनीतिक संगठन नहीं है। इसके सदस्य देशों के हित कई मुद्दों पर अलग-अलग हैं।
ब्रिक्स की असली ताकत शायद इसी में है कि अलग-अलग विचार रखने वाले देश साझा आर्थिक हितों पर एक साथ काम कर सकें। भुगतान व्यवस्था, वैकल्पिक वित्तीय माध्यम, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर सहयोग इसकी भूमिका को मजबूत कर सकता है।
दुनिया की बदलती व्यवस्था का संकेत
इस बार का ब्रिक्स सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान संकट, भारत-चीन संबंध, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार की बदलती परिस्थितियों के बीच यह सम्मेलन दुनिया में उभर रही बहुध्रुवीय व्यवस्था की तस्वीर भी पेश कर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स के सभी देश हर मुद्दे पर एक राय बना पाएंगे या नहीं। बल्कि चुनौती यह है कि मतभेदों के बावजूद क्या वे आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ा सकते हैं।
भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए भी अहम है क्योंकि नई दिल्ली को एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध बनाए रखने हैं, वहीं रूस, चीन, ईरान और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी अपने हितों को संतुलित करना है। यही संतुलन इस बार के ब्रिक्स सम्मेलन को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना रहा है।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
