पीएम मोदी का चीन दौरा: क्या सुधरेंगे रिश्ते या फिर होगा धोखा?
Central News Desk: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आगामी चीन दौरा न केवल कूटनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है, बल्कि इसे भारत-चीन संबंधों के भविष्य की दिशा तय करने वाला अवसर भी कहा जा रहा है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका ने भारत और चीन दोनों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाकर वैश्विक व्यापार को झकझोर दिया है। ऐसे में मोदी का यह दौरा चीन और भारत को एकजुट होकर अमेरिका को चुनौती देने का संकेत भी दे सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नजदीकी वाकई भरोसेमंद होगी?

अमेरिका का टैरिफ वॉर और भारत-चीन समीकरण
अमेरिका ने हाल ही में चीन के कई उत्पादों पर 125% से ज्यादा और भारत पर 50% तक का आयात शुल्क लगा दिया है। इससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। ऐसे में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात बेहद अहम होगी। कयास यह भी हैं कि दोनों देश अमेरिका को साफ संदेश देंगे कि एशिया की दो बड़ी ताकतें मिलकर इस दबाव का सामना कर सकती हैं।
रिश्तों का इतिहास: गर्मजोशी से धोखाधड़ी तक
भारत-चीन रिश्तों का इतिहास कभी गर्मजोशी तो कभी अविश्वास से भरा रहा है।
2014 में शी जिनपिंग भारत आए और दोनों देशों के बीच नए व्यापारिक समझौते हुए।
2015 में मोदी चीन गए और संबंध सुधारते दिखे।
लेकिन 2017 में डोकलाम विवाद ने रिश्तों में खटास डाल दी।
2018 वुहान और 2019 मामल्लपुरम में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन हुए, जिससे उम्मीद जगी कि संबंध पटरी पर लौटेंगे।
मगर 2020 में गलवान घाटी की झड़प ने दशकों में सबसे बड़ा अविश्वास पैदा कर दिया। भारत ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया और निवेश के नियम सख्त कर दिए।
यानी जब-जब नजदीकी बढ़ी, चीन की ओर से धोखा भी सामने आया।
सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश
इस दौरे से पहले दोनों देशों ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए एक विशेषज्ञ समूह (Expert Group) बनाने पर सहमति जताई है। यह समूह सीमाओं के निर्धारण और बॉर्डर ट्रेड पॉइंट्स (शिपकी ला, लिपुलेख) खोलने पर काम करेगा। इससे उम्मीद है कि दोनों पक्ष लंबे समय से चले आ रहे विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रयास करेंगे
क्या चीनी ऐप्स की होगी वापसी?
गलवान के बाद भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा गोपनीयता का हवाला देते हुए टिकटॉक, यूसी ब्राउजर, पबजी जैसे सैकड़ों चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार का रुख अभी भी कड़ा है और उसने इस बात से इनकार किया है कि प्रतिबंधित ऐप्स को वापसी की अनुमति मिलेगी।
हालांकि, विरोधाभास यह है कि राजनीतिक तनाव के बावजूद चीन 2023-24 में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना रहा। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध अब भी गहरे हैं। यदि रिश्ते सुधरते हैं तो निवेश और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग की नई संभावनाएं खुल सकती हैं, लेकिन सरकार शायद सुरक्षा के मुद्दों पर समझौता न करे।
मोदी की यात्रा: कूटनीति या ऐतिहासिक मौका?
यह दौरा सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं बल्कि ऐतिहासिक मौके की तरह देखा जा रहा है। अगर मोदी और शी जिनपिंग भरोसे का नया पुल बना पाए, तो भारत-चीन मिलकर वैश्विक राजनीति और व्यापार को नया आयाम दे सकते हैं। लेकिन अगर चीन ने फिर वही पुराना रवैया अपनाया तो यह नजदीकी अल्पकालिक साबित होगी।
पीएम मोदी का चीन दौरा रिश्तों में नई शुरुआत की संभावना तो जरूर जगाता है, लेकिन बीते अनुभवों को देखते हुए भारत को सतर्क रहना ही होगा।
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