ऑफिस पहुंचने की कीमत: कोई 2,400 रुपए खर्च कर रहा, तो कोई सिर्फ 423 रुपए में तय कर रहा सफर, जानिए आपके राज्य का हाल
CENTRAL NEWS DESK: नौकरी मिलना आज के युवाओं के लिए बड़ी उपलब्धि है, लेकिन नौकरी मिलने के बाद हर महीने होने वाले खर्च का हिसाब भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। घर से दफ्तर तक पहुंचने में लगने वाला समय, पेट्रोल का खर्च, बस या ऑटो का किराया और रोजाना की भागदौड़ सीधे जेब पर असर डालती है। खासकर उन युवाओं के लिए यह खर्च महत्वपूर्ण हो जाता है, जो पहली नौकरी शुरू कर रहे हैं और सीमित सैलरी में अपने खर्च के साथ बचत का भी हिसाब रखना चाहते हैं।
भारत में काम पर आने-जाने के खर्च को लेकर सामने आए हाउसहोल्ड ट्रैवल इन इंडिया 2025-26 के ग्राफिक्स में राज्यों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में औसत मासिक यात्रा खर्च 714 रुपये है, जबकि दिल्ली में यह 2,052 रुपये तक पहुंचता है। बिहार में यही खर्च 492 रुपये दर्ज किया गया है। दूसरी ओर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में औसत मासिक खर्च 2,409 रुपये दिखाया गया है।
इन आंकड़ों के साथ ही यह भी सामने आता है कि देश में लोग काम पर पहुंचने के लिए किन साधनों का इस्तेमाल करते हैं और महिला-पुरुष कर्मचारियों के यात्रा खर्च में कितना अंतर है। दोपहिया वाहन का इस्तेमाल सबसे अधिक दिखाई देता है, जबकि पैदल चलने और साइकिल से सफर करने वालों की हिस्सेदारी भी काफी बड़ी है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नौकरी से कितनी कमाई हो रही है, बल्कि यह भी है कि उस कमाई का कितना हिस्सा रोजाना आने-जाने में खर्च हो जाता है।

किसी राज्य में 500 रुपये से कम, तो कहीं 2,400 रुपये से ज्यादा खर्च
काम पर आने-जाने का मासिक खर्च हर राज्य में एक जैसा नहीं है। उपलब्ध ग्राफिक के अनुसार, बिहार में औसत मासिक यात्रा खर्च 492 रुपये है। मध्य प्रदेश में यह 465 रुपये और पश्चिम बंगाल में 582 रुपये दर्ज किया गया है। उत्तर प्रदेश में काम पर आने-जाने का औसत मासिक खर्च 714 रुपये दिखाया गया है।
इसके मुकाबले दिल्ली में यह खर्च 2,052 रुपये तक पहुंचता है। गोवा में औसत मासिक यात्रा खर्च 1,941 रुपये और केरल में 1,565 रुपये दर्ज किया गया है। मिजोरम में यह आंकड़ा 1,558 रुपये है, जबकि महाराष्ट्र में 1,018 रुपये का औसत मासिक खर्च दिखाया गया है।
राजस्थान में यह खर्च 874 रुपये और गुजरात में 871 रुपये दर्ज किया गया है। तमिलनाडु में औसत मासिक यात्रा खर्च 957 रुपये बताया गया है। वहीं, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में यह आंकड़ा 2,409 रुपये तक पहुंच जाता है।
इन आंकड़ों को देखने पर स्पष्ट होता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में रोजाना की यात्रा के लिए खर्च की जाने वाली रकम में बड़ा अंतर है। हालांकि, इन अंतरों को केवल महंगाई या परिवहन व्यवस्था से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। यात्रा की दूरी, आने-जाने के साधन, स्थानीय सुविधाएं और काम की जगह तक पहुंचने के विकल्प भी खर्च को प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में 714 रुपये औसत मासिक यात्रा खर्च
उत्तर प्रदेश में नौकरी या काम के लिए आने-जाने का औसत मासिक खर्च 714 रुपये बताया गया है। बिहार और मध्य प्रदेश की तुलना में यह आंकड़ा अधिक है, लेकिन दिल्ली और गोवा जैसे स्थानों के मुकाबले काफी कम है।
राज्य के भीतर भी लोगों की यात्रा की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। बड़े शहरों में रहने वाले कर्मचारियों को घर से दफ्तर पहुंचने के लिए ऑटो, बस, निजी दोपहिया वाहन या दूसरे साधनों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। वहीं, छोटे शहरों में कुछ लोगों के लिए कार्यस्थल तक पहुंचने की दूरी कम हो सकती है।
युवाओं के लिए नौकरी चुनते समय यह अंतर महत्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी व्यक्ति को ऐसी नौकरी मिलती है जिसमें सैलरी तो ठीक है, लेकिन दफ्तर घर से काफी दूर है, तो आने-जाने का खर्च उसकी बचत कम कर सकता है। इसके उलट, घर के नजदीक काम मिलने या सार्वजनिक परिवहन की सुविधा उपलब्ध होने पर हर महीने खर्च नियंत्रित करना आसान हो सकता है।
हालांकि, राज्य के औसत आंकड़े किसी एक कर्मचारी के वास्तविक खर्च की गारंटी नहीं देते। किसी व्यक्ति का खर्च उसके सफर की दूरी, काम के दिनों और इस्तेमाल किए जाने वाले वाहन पर निर्भर करेगा।
दिल्ली में 2,052 रुपये का मासिक खर्च, युवाओं के बजट पर कितना असर?
दिल्ली में औसत मासिक यात्रा खर्च 2,052 रुपये दर्ज किया गया है। यह बिहार के 492 रुपये के आंकड़े से काफी अधिक है। गोवा में यह खर्च 1,941 रुपये है, जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में यह 2,409 रुपये तक पहुंचता है। नौकरी की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए हर महीने दो हजार रुपये से अधिक का यात्रा खर्च एक महत्वपूर्ण बजट मद बन सकता है। सैलरी मिलने के बाद किराया, भोजन, मोबाइल बिल, जरूरी खरीदारी और बचत जैसी जरूरतों के बीच सफर पर होने वाले खर्च का भी हिसाब रखना पड़ता है।
यदि किसी युवा को नौकरी के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, तो यात्रा पर खर्च होने वाली रकम महीने के आखिर में उसकी बचत को प्रभावित कर सकती है। इसीलिए नौकरी की पेशकश स्वीकार करने से पहले केवल सैलरी देखना पर्याप्त नहीं है। दफ्तर की दूरी और वहां पहुंचने के साधनों का आकलन करना भी उपयोगी है।
दिल्ली के आंकड़े यह दिखाते हैं कि काम पर पहुंचने के लिए होने वाला खर्च कुछ क्षेत्रों में काफी बड़ा हो सकता है। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध ग्राफिक औसत खर्च बताता है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दिल्ली में हर कर्मचारी हर महीने ठीक 2,052 रुपये ही खर्च करता है।
ऑफिस पहुंचने के लिए सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन का इस्तेमाल
भारत में काम पर पहुंचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले साधनों में दोपहिया वाहन सबसे आगे है। उपलब्ध ग्राफिक के मुताबिक, काम पर जाने के लिए दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी 42.6 परसेंट है। यानी दिखाए गए आंकड़ों में सबसे बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो दोपहिया वाहन से सफर करते हैं।
इसके बाद पैदल चलने वालों की हिस्सेदारी 28.3 परसेंट दर्ज की गई है। साइकिल से काम पर पहुंचने वालों की हिस्सेदारी 10.7 परसेंट है। बस से सफर करने वालों का हिस्सा 6.7 परसेंट और ऑटो-रिक्शा से आने-जाने वालों की हिस्सेदारी 6.4 परसेंट बताई गई है।
कार से काम पर पहुंचने वालों की हिस्सेदारी 3 परसेंट है। ट्रेन, मोनोरेल और ट्राम जैसे साधनों का हिस्सा 2.1 परसेंट दिखाया गया है, जबकि अन्य साधनों की हिस्सेदारी 1 परसेंट है।
ये आंकड़े बताते हैं कि काम पर पहुंचने के लिए लोग अलग-अलग तरह के साधनों पर निर्भर हैं। दोपहिया वाहनों की बड़ी हिस्सेदारी के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जैसे अपनी सुविधा के अनुसार सफर करना और घर से कार्यस्थल तक सीधे पहुंचना। हालांकि, उपलब्ध ग्राफिक इन कारणों की पुष्टि नहीं करता।
वहीं, पैदल चलने और साइकिल का इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी भी ध्यान देने योग्य है। कम दूरी तय करने वाले लोगों के लिए ये साधन यात्रा खर्च बचाने में मददगार हो सकते हैं। लेकिन हर व्यक्ति के लिए पैदल चलना या साइकिल से सफर करना संभव नहीं होता। यह कार्यस्थल की दूरी, सड़क की स्थिति, मौसम और उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर करता है।
बस से सफर करने वालों की हिस्सेदारी 6.7 परसेंट
काम पर आने-जाने के लिए बस का इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी 6.7 परसेंट दिखाई गई है। सार्वजनिक परिवहन उन लोगों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है, जिन्हें रोजाना एक निश्चित मार्ग पर सफर करना होता है।
बस से सफर करने का वास्तविक खर्च शहर, दूरी और उपलब्ध सेवा के अनुसार बदल सकता है। जहां बस सेवा सुविधाजनक है, वहां कर्मचारी निजी वाहन के इस्तेमाल को कम करने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, बस की उपलब्धता, भीड़, समय और घर से बस स्टॉप की दूरी भी लोगों के फैसले को प्रभावित कर सकती है।
ऑटो-रिक्शा से काम पर जाने वालों की हिस्सेदारी 6.4 परसेंट है। यह साधन उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिन्हें घर से मुख्य सड़क, बस स्टॉप या दफ्तर तक पहुंचने के लिए छोटी दूरी तय करनी होती है। लेकिन नियमित रूप से ऑटो का इस्तेमाल करने पर कुल खर्च कितना होगा, यह रोजाना की दूरी और किराये पर निर्भर करता है।
कार से आने-जाने वालों की हिस्सेदारी 3 परसेंट है। दूसरी ओर, ट्रेन, मोनोरेल और ट्राम जैसे साधनों की हिस्सेदारी 2.1 परसेंट दर्ज की गई है। इससे पता चलता है कि ग्राफिक में इन साधनों का हिस्सा दोपहिया वाहन, पैदल चलने और साइकिल की तुलना में कम है।
पैदल चलकर ऑफिस पहुंचते हैं 28.3 परसेंट लोग
दोपहिया वाहनों के बाद पैदल चलकर काम पर पहुंचने वालों की हिस्सेदारी 28.3 परसेंट है। यह आंकड़ा बताता है कि काम पर जाने के लिए पैदल चलना भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
जिन लोगों का कार्यस्थल घर के नजदीक है, उनके लिए पैदल जाना यात्रा खर्च बचाने का विकल्प हो सकता है। इससे बस, ऑटो या निजी वाहन पर निर्भरता कम की जा सकती है। हालांकि, पैदल चलने की सुविधा हर जगह एक जैसी नहीं होती। सुरक्षित फुटपाथ, सड़क की स्थिति, मौसम और तय की जाने वाली दूरी जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हैं।
साइकिल से काम पर पहुंचने वालों की हिस्सेदारी 10.7 परसेंट है। साइकिल उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन्हें कम या मध्यम दूरी तय करनी होती है और जिनके मार्ग पर साइकिल चलाने की सुविधा मौजूद है।
इस तरह पैदल चलना और साइकिल चलाना दोनों ही यात्रा के ऐसे विकल्प हैं, जिनसे कुछ लोगों को नियमित खर्च कम रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन इनका इस्तेमाल व्यक्ति की परिस्थितियों और उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर करता है।
पुरुष कर्मचारियों का यात्रा खर्च महिलाओं से करीब 57 परसेंट ज्यादा
आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण पहलू महिला और पुरुष कर्मचारियों के औसत मासिक यात्रा खर्च का अंतर है। उपलब्ध ग्राफिक के अनुसार, पुरुष कर्मचारियों का औसत मासिक यात्रा खर्च 835 रुपये है, जबकि महिला कर्मचारियों का खर्च 533 रुपये दर्ज किया गया है।
दोनों के बीच 302 रुपये का अंतर है। महिला कर्मचारियों के औसत खर्च की तुलना में पुरुष कर्मचारियों का खर्च करीब 57 परसेंट अधिक बैठता है।
यह अंतर अपने आप में ध्यान खींचता है, लेकिन केवल इन आंकड़ों के आधार पर इसके पीछे की वजह तय नहीं की जा सकती। पुरुष और महिला कर्मचारियों की यात्रा दूरी, काम की जगह, परिवहन के साधन और रोजाना आने-जाने की परिस्थितियों में अंतर हो सकता है। उपलब्ध ग्राफिक इन कारणों का विस्तृत ब्यौरा नहीं देता।
इसलिए इन आंकड़ों को खर्च के अंतर के रूप में देखना चाहिए, न कि यह मान लेना चाहिए कि हर पुरुष कर्मचारी हर महिला कर्मचारी से अधिक खर्च करता है। ये आंकड़े औसत हैं और किसी एक व्यक्ति की स्थिति का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करते।
छात्रों के खर्च में कम अंतर, पुरुष छात्र 460 और महिला छात्र 423 रुपये खर्च करते हैं
कर्मचारियों के मुकाबले छात्रों के औसत मासिक यात्रा खर्च में अंतर कम दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पुरुष छात्रों का औसत मासिक यात्रा खर्च 460 रुपये है, जबकि महिला छात्रों का खर्च 423 रुपये दर्ज किया गया है।
दोनों के बीच केवल 37 रुपये का अंतर है। कर्मचारियों के मामले में जहां पुरुषों और महिलाओं के औसत खर्च में 302 रुपये का अंतर दिखाया गया है, वहीं छात्रों के मामले में यह अंतर काफी कम है।
छात्रों का यात्रा खर्च स्कूल या कॉलेज की दूरी, परिवहन के साधन और आने-जाने के तरीकों पर निर्भर कर सकता है। कुछ छात्र पैदल या साइकिल से संस्थान पहुंचते हैं, जबकि दूसरे बस, ऑटो या निजी वाहन का इस्तेमाल कर सकते हैं।
हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि छात्रों के बीच खर्च का अंतर कम क्यों है। इसके लिए यात्रा की दूरी, परिवहन के साधनों और दूसरे पहलुओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी की जरूरत होगी।
जेन-ज़ी के लिए नौकरी की सैलरी के साथ यात्रा खर्च समझना क्यों जरूरी?
आज नौकरी शुरू करने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है सीमित आमदनी में अपने खर्च का संतुलन बनाना। पहली नौकरी मिलने पर अक्सर ध्यान मिलने वाली सैलरी, कंपनी और करियर में आगे बढ़ने के अवसरों पर रहता है। लेकिन रोजाना ऑफिस पहुंचने में होने वाला खर्च भी महीने के बजट का हिस्सा होता है।
मान लीजिए कि किसी युवा को पहली नौकरी में हर महीने एक निश्चित सैलरी मिलती है। उसे घर से दफ्तर तक पहुंचने के लिए रोजाना बस, ऑटो या दोपहिया वाहन का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में महीने के आखिर तक यात्रा पर होने वाली कुल रकम उसकी बचत को प्रभावित कर सकती है।
अगर दफ्तर घर से काफी दूर है, तो सफर में समय भी अधिक लग सकता है। लंबे सफर के कारण आने-जाने में ज्यादा समय खर्च होता है, जबकि घर के नजदीक काम मिलने पर उस समय का इस्तेमाल पढ़ाई, आराम या दूसरी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।
इसी वजह से नौकरी का चुनाव करते समय केवल वेतन की तुलना करना पर्याप्त नहीं है। दफ्तर तक पहुंचने में लगने वाला समय, परिवहन के उपलब्ध विकल्प और महीने का अनुमानित यात्रा खर्च भी देखना उपयोगी है।
यह बात खासकर उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो पढ़ाई पूरी करने के बाद पहली बार नौकरी कर रहे हैं या अपने शहर से दूसरे शहर में काम करने जा रहे हैं।
नौकरी चुनने से पहले इन खर्चों का भी रखें हिसाब
नौकरी की पेशकश मिलने पर युवाओं को अपनी सैलरी और जरूरी खर्चों का हिसाब एक साथ लगाना चाहिए। इसमें घर से दफ्तर तक आने-जाने का खर्च भी शामिल होना चाहिए। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि सभी नियमित खर्चों के बाद कितनी रकम बच सकती है।
अगर सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है, तो उसके किराये और समय की तुलना निजी वाहन के इस्तेमाल से की जा सकती है। निजी दोपहिया वाहन से सफर करने वालों को केवल पेट्रोल का खर्च ही नहीं, बल्कि वाहन के रखरखाव और पार्किंग जैसी संभावित लागतों पर भी ध्यान देना चाहिए।
वहीं, जिनका कार्यस्थल घर के नजदीक है, वे पैदल चलने या साइकिल का विकल्प भी देख सकते हैं, बशर्ते दूरी और रास्ता इसके अनुकूल हों।
यात्रा के खर्च का बजट बनाने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को सबसे सस्ता साधन ही चुनना चाहिए। सुरक्षा, समय और सुविधा भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। सही विकल्प वह होगा, जो व्यक्ति की जरूरतों और आर्थिक स्थिति के अनुकूल हो।
क्या कम यात्रा खर्च का मतलब ज्यादा बचत है?
कम यात्रा खर्च से किसी व्यक्ति को बचत करने में मदद मिल सकती है, लेकिन केवल इसी आधार पर उसकी कुल बचत का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। किसी कर्मचारी के घर का किराया, भोजन, परिवार की जिम्मेदारियां और दूसरे जरूरी खर्च भी उसकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।
इसी तरह, अधिक यात्रा खर्च करने वाला हर व्यक्ति जरूरी नहीं कि कम बचत करता हो। उसकी सैलरी और दूसरे खर्चों के आधार पर वास्तविक स्थिति अलग हो सकती है।
राज्यों के औसत यात्रा खर्च को इसी नजरिये से समझना जरूरी है। ये आंकड़े अलग-अलग जगहों पर सफर की लागत की तुलना करने का आधार देते हैं, लेकिन हर शहर, कर्मचारी या छात्र के खर्च की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते।
सफर का खर्च भी नौकरी के फैसले का हिस्सा बने
भारत में काम पर पहुंचने के साधनों और यात्रा खर्च के ये आंकड़े बताते हैं कि रोजाना का सफर लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध ग्राफिक में दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी 42.6 परसेंट है, जबकि पैदल चलने वालों की हिस्सेदारी 28.3 परसेंट और साइकिल का इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी 10.7 परसेंट है।
राज्यों के बीच भी औसत मासिक यात्रा खर्च में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में यह 714 रुपये, दिल्ली में 2,052 रुपये और बिहार में 492 रुपये दर्ज किया गया है। वहीं, पुरुष कर्मचारियों और महिला कर्मचारियों के औसत खर्च में 302 रुपये का अंतर है, जबकि पुरुष और महिला छात्रों के बीच यह अंतर 37 रुपये है।
जेन-ज़ी और नौकरी की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए इन आंकड़ों से मिलने वाला व्यावहारिक संदेश यही है कि करियर का फैसला करते समय सैलरी के साथ रोजाना की यात्रा को भी ध्यान में रखना चाहिए। दफ्तर की दूरी, सफर में लगने वाला समय और परिवहन के विकल्प समझकर महीने का बजट बनाया जा सकता है।
सोर्स: हाउसहोल्ड ट्रैवल इन इंडिया 2025-26
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
