ग्लेशियर पिघले, झीलें फटीं और आया जलप्रलय! 15 साल में हिमालय की 5 बड़ी तबाहियों का कारण

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नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर हिमालय के बदलते स्वरूप और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भोटेकोशी नदी में अचानक आए सैलाब ने कुछ ही समय में पुलों, सड़कों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। आखिर ग्लेशियर से बनी झीलें कैसे फटती हैं और क्यों हिमालयी इलाकों में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है?

CENTRAL NEWS DESK: हिमालय को लंबे समय से भारत और दक्षिण एशिया के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना जाता रहा है। यही पर्वत श्रृंखला करोड़ों लोगों के लिए नदियों और पानी का बड़ा स्रोत है। लेकिन अब यही हिमालय लगातार बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण एक नए खतरे का संकेत भी दे रहा है। नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने इस खतरे को फिर सामने ला दिया। चीन-नेपाल सीमा की तरफ से आए पानी और मलबे ने भोटेकोशी नदी को अचानक उफान पर ला दिया। कई इलाकों में पानी के साथ बर्फ, चट्टानें और भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर बहा।

इस घटना के पीछे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी ग्लेशियर से बनी झील के अचानक फटने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि मौजूदा घटना की अंतिम वैज्ञानिक वजह की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

कैसे फटती है ग्लेशियल झील

इसे समझने के लिए पहले ग्लेशियर को समझना जरूरी है। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियर धीरे-धीरे आगे बढ़ते और पीछे हटते रहते हैं। इस दौरान वे अपने साथ मिट्टी, रेत, बजरी और बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी खिसकाते हैं। लंबे समय में यही मलबा ग्लेशियर के सामने या आसपास एक प्राकृतिक बांध जैसा ढांचा बना देता है, जिसे मोरेन कहा जाता है। ग्लेशियर के पिघलने से आने वाला पानी इस प्राकृतिक बांध के पीछे जमा होता रहता है और धीरे-धीरे एक झील का रूप ले लेता है।

यहीं से खतरा शुरू होता है। अगर तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगे, तो झील में पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। दूसरी तरफ भूकंप, चट्टान या बर्फ का बड़ा हिस्सा झील में गिर जाए तो अचानक भारी लहर पैदा हो सकती है।

ऐसी स्थिति में मोरेन का प्राकृतिक बांध टूट सकता है। इसके बाद झील का पानी किसी सामान्य नदी की तरह नहीं बहता, बल्कि बर्फ, पत्थर, मिट्टी और मलबे का विशाल सैलाब बनकर घाटियों की तरफ दौड़ता है। यही स्थिति ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहलाती है।

नेपाल में इस बार मचा इतना बड़ा सैलाब

नेपाल की भोटेकोशी नदी में आया पानी अपने साथ भारी मात्रा में मलबा लेकर नीचे की तरफ आया। तेज बहाव के कारण नदी का जलस्तर बहुत कम समय में कई मीटर तक बढ़ने की जानकारी सामने आई है। नदी के किनारे मौजूद सड़कें, पुल और दूसरी संरचनाएं इस तरह के तेज बहाव का सामना नहीं कर पाईं। रसुवा जिले के तिमुरे, स्याफ्रुबेसी और सीमा से लगे इलाकों में भारी नुकसान की खबर सामने आई। कई जगहों पर संपर्क टूट गया और राहत-बचाव दलों के लिए प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हो गया। यही वजह है कि हिमालयी इलाकों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी अब बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हिमालय में बढ़ रही हैं खतरनाक ग्लेशियल झीलें

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO की रिपोर्ट के मुताबिक, 1984 से 2023 के बीच हिमालयी क्षेत्र में अध्ययन की गई 2,431 बड़ी ग्लेशियल झीलों में से 676 झीलों के आकार में बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें भारत के सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में स्थित 130 झीलें भी शामिल हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हर बढ़ती हुई झील निश्चित रूप से फटेगी। लेकिन झीलों का बढ़ना संभावित जोखिम को बढ़ा सकता है, खासकर तब जब उनके प्राकृतिक बांध कमजोर हों। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के पीछे हटने से इस जोखिम पर वैज्ञानिक लगातार नजर रख रहे हैं।

15 साल में हिमालय में 5 बड़ी तबाहियां

नेपाल की मौजूदा घटना से पहले भी हिमालयी क्षेत्र कई बार ग्लेशियर, बर्फ, झील और अचानक आई बाढ़ से जुड़ी बड़ी आपदाओं का सामना कर चुका है।

1. केदारनाथ, 2013: हजारों जिंदगियां तबाह

जून 2013 में उत्तराखंड की केदारनाथ घाटी में आई आपदा हिमालयी क्षेत्र की सबसे विनाशकारी घटनाओं में गिनी जाती है। भारी बारिश के बीच चोराबाड़ी झील क्षेत्र से पानी और मलबे का तेज बहाव आया। मंदाकिनी नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया और केदारनाथ सहित आसपास के इलाकों में भारी तबाही मची। सैलाब अपने साथ पुल, सड़कें, मकान और रास्ते बहा ले गया। केदारनाथ तक जाने वाला करीब 14 किलोमीटर लंबा पैदल मार्ग भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। उत्तराखंड सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस आपदा में 5,700 से ज्यादा लोगों के मारे जाने या लापता होने की पुष्टि की गई थी। बाद में आधिकारिक आंकड़ा 6,054 तक पहुंचा। यह हादसा आज भी हिमालयी आपदाओं का सबसे भयावह उदाहरण माना जाता है।

2. सिक्किम, 2023: साउथ ल्होनक झील का कहर

अक्टूबर 2023 में सिक्किम में साउथ ल्होनक ग्लेशियल झील के फटने से तीस्ता नदी में अचानक भारी बाढ़ आ गई। माना गया कि झील के प्राकृतिक बांध का एक हिस्सा टूटने के बाद पानी तेजी से नीचे आया। इसके रास्ते में बर्फ, चट्टानें और मलबा भी शामिल था। बाढ़ ने सड़कें और पुल तबाह कर दिए। कई बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ और हजारों लोग प्रभावित हुए। सरकारी आंकड़ों में 70 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं, जबकि बड़ी संख्या में लोग लापता भी हुए थे।

3. चमोली, 2021: बर्फ और मलबे का खौफनाक सैलाब

7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के चमोली जिले में अचानक आया सैलाब कई जिंदगियां बहा ले गया। एक बड़े बर्फीले हिस्से के टूटने और नीचे गिरने के बाद पानी और मलबे का तेज बहाव ऋषिगंगा और धौलीगंगा की तरफ बढ़ा। इस आपदा में 200 से ज्यादा लोगों के मारे जाने या लापता होने की जानकारी सामने आई थी। ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना को भारी नुकसान हुआ और कई पुल तथा सड़कें भी बह गईं। यह घटना बताती है कि ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ और चट्टान का अचानक टूटना किस तरह कुछ ही मिनटों में नदियों को विनाशकारी रूप दे सकता है।

जून 2021 में नेपाल के सिंधुपालचोक जिले में मेलमची नदी में अचानक भीषण बाढ़ आई।

4. नेपाल की मेलमची बाढ़, 2021

जून 2021 में नेपाल के सिंधुपालचोक जिले में मेलमची नदी में अचानक भीषण बाढ़ आई। लगातार बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में जमा पानी को इस आपदा से जोड़कर देखा गया। बाढ़ ने घरों और सड़कों को नुकसान पहुंचाया तथा कई इलाकों का संपर्क टूट गया। मेलमची बाजार में भारी मात्रा में मलबा जमा हो गया था। इस घटना में अलग-अलग रिपोर्टों में मौतों के आंकड़े अलग रहे, लेकिन यह आपदा नेपाल में अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे का बड़ा उदाहरण बनी।

भोटेकोशी, 2016: 10 साल पहले भी आया था सैलाब

5. भोटेकोशी, 2016: 10 साल पहले भी आया था सैलाब

जिस भोटेकोशी नदी ने इस बार नेपाल में तबाही मचाई है, वह करीब एक दशक पहले भी इसी तरह के खतरे का सामना कर चुकी है। जुलाई 2016 में तिब्बत-नेपाल सीमा के पास ग्लेशियल झील से जुड़े एक अचानक सैलाब ने भोटेकोशी नदी में पानी का स्तर बढ़ा दिया था। इससे आसपास के इलाकों और पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा था। यानी भोटेकोशी घाटी के लिए यह खतरा नया नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार तबाही का पैमाना कहीं ज्यादा गंभीर दिखाई दे रहा है।

क्या ग्लेशियर ही हैं इन आपदाओं की एकमात्र वजह

नहीं। यह समझना जरूरी है कि हर हिमालयी फ्लैश फ्लड ग्लेशियर फटने की वजह से नहीं आती। भारी बारिश, बादल फटना, भूस्खलन, भूकंप, बर्फ का टूटना और ग्लेशियल झील का अचानक फटना इनमें से एक या कई कारण मिलकर ऐसी आपदा पैदा कर सकते हैं। कई बार पहाड़ से गिरने वाली चट्टान या बर्फ किसी नदी या झील का रास्ता रोक देती है। जब यह प्राकृतिक बांध टूटता है तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहता है। इसलिए नेपाल की मौजूदा घटना की वास्तविक वजह तय करने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है।

क्या जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है खतरा

वैज्ञानिकों की चिंता का बड़ा कारण यही है कि हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कई जगहों पर उनके पिघलने की गति बढ़ रही है। इससे ग्लेशियरों के सामने या आसपास पानी जमा होकर बड़ी झीलों का रूप ले सकता है। लेकिन किसी एक आपदा को सीधे सिर्फ जलवायु परिवर्तन के खाते में डालना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। स्थानीय भूगोल, बारिश, भूकंपीय गतिविधि, झील की संरचना और ग्लेशियर की स्थिति सभी कारकों की भूमिका हो सकती है।

पेरू की 1970 की आपदा: जब पूरा शहर मलबे में दब गया

ग्लेशियर और बर्फ से जुड़ी आपदाओं का सबसे भयावह उदाहरण हिमालय से हजारों किलोमीटर दूर पेरू में देखने को मिला था। 1970 में आए शक्तिशाली भूकंप के बाद हुस्कारान पर्वत का बड़ा हिस्सा टूट गया। बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल सैलाब नीचे की ओर आया और युंगाय शहर को अपनी चपेट में ले लिया। इस आपदा में 18 हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने की जानकारी सामने आई थी। यह घटना आज भी दुनिया की सबसे भयावह पर्वतीय आपदाओं में गिनी जाती है।

हिमालय में छोटा सा बदलाव डालता है गहरा असर

नेपाल की मौजूदा बाढ़ ने एक बड़ा सवाल फिर सामने खड़ा कर दिया है क्या हिमालयी इलाकों में विकास परियोजनाओं के साथ आपदा के खतरे को भी उतनी ही गंभीरता से समझा जा रहा है? हाइड्रोपावर परियोजनाएं, सड़कें, पुल और सीमावर्ती बस्तियां अक्सर उन्हीं नदी घाटियों में स्थित होती हैं जहां अचानक बाढ़ का खतरा सबसे ज्यादा होता है। ऐसे में सिर्फ आपदा आने के बाद राहत अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी हो, संवेदनशील झीलों की पहचान की जाए और नदी घाटियों में रहने वाले लोगों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत किए जाएं। क्योंकि हिमालय सिर्फ बर्फ और पहाड़ों का नाम नहीं है। यहां होने वाला छोटा-सा बदलाव नीचे बसे हजारों लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डाल सकता है।

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