958 सिविल सर्विस उम्मीदवारों की किस्मत पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, OBC क्रीमी लेयर ने बढ़ाई टेंशन

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OBC क्रीमी लेयर के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर बड़ा मामला सामने आया है। कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार की उस मांग पर स्पेशल बेंच गठित करने पर सहमति जताई, जिसमें 11 मार्च 2026 के फैसले को सिविल सर्विसेज एग्जामिनेशन (CSE) 2025 के उम्मीदवारों पर लागू करने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

केंद्र सरकार चाहती है कि यूपीएससी द्वारा अनुशंसित 958 उम्मीदवारों की सर्विस अलॉटमेंट फिलहाल उसी OBC क्रीमी लेयर व्यवस्था के आधार पर की जाए, जो 11 मार्च के फैसले से पहले लागू थी। सरकार का तर्क है कि परीक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमों की नई व्याख्या लागू करने से उम्मीदवारों के साथ असमानता और प्रशासनिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

क्या है पूरा विवाद

मामला सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च 2026 के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ फैसले से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा था कि OBC क्रीमी लेयर तय करने के लिए माता-पिता की सैलरी या आय को अकेला आधार नहीं बनाया जा सकता। माता-पिता की नौकरी की स्थिति, पद की श्रेणी और 1993 के निर्धारित नियमों के तहत अन्य मानकों को भी देखा जाना जरूरी है।

कोर्ट ने यह भी माना था कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता की सिर्फ आय के आधार पर बच्चे को OBC क्रीमी लेयर में रखना उचित नहीं होगा।

958 उम्मीदवारों पर क्यों पड़ा असर?

यूपीएससी ने CSE-2025 का अंतिम परिणाम 6 मार्च 2026 को जारी किया था और कुल 958 उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए सिफारिश की थी। इसके ठीक पांच दिन बाद 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का क्रीमी लेयर संबंधी फैसला आया।

केंद्र का कहना है कि उम्मीदवारों ने परीक्षा के दौरान उस समय लागू नियमों और उनकी प्रशासनिक व्याख्या के आधार पर आवेदन किया था। ऐसे में बाद में बदली हुई व्याख्या को पिछली प्रक्रिया पर लागू करने से कई तरह के विवाद पैदा हो सकते हैं।

सरकार के मुताबिक, कुछ उम्मीदवारों ने माता-पिता की आय के कारण खुद को OBC-नॉन-क्रीमी लेयर के लिए अयोग्य मानकर जनरल कैटेगरी में आवेदन किया होगा। ऐसे उम्मीदवारों ने OBC को मिलने वाली उम्र में छूट और अतिरिक्त प्रयास जैसे लाभ भी नहीं लिए होंगे।

सरकार की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

केंद्र का कहना है कि यदि अब सभी उम्मीदवारों की OBC क्रीमी लेयर स्थिति नए तरीके से जांची गई तो सर्विस अलॉटमेंट, कैडर आवंटन, वरिष्ठता, वेतन निर्धारण और ट्रेनिंग तक प्रभावित हो सकती है। CSE-2025 बैच का फाउंडेशन कोर्स भी अगस्त के अंतिम सप्ताह में शुरू होने की योजना है।

यही वजह है कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट निर्देश मांगे हैं कि CSE-2025 में पुराने क्रीमी लेयर मानदंड लागू करके 958 उम्मीदवारों की सर्विस अलॉटमेंट पूरी करने की अनुमति दी जाए।

क्रीमी लेयर आखिर क्या है?

OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर का मतलब OBC समुदाय के उन अपेक्षाकृत आगे बढ़ चुके वर्गों से है, जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का फायदा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों तक पहुंचे।

1993 के सरकारी नियमों में क्रीमी लेयर तय करने के लिए विभिन्न मानदंड निर्धारित किए गए थे। विवाद खास तौर पर इस बात को लेकर रहा कि निजी या पीएसयू में काम करने वाले माता-पिता की सैलरी को किस तरह देखा जाए।

अब आगे क्या होगा

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि इस मामले के लिए स्पेशल बेंच गठित करनी होगी और इस संबंध में अन्य न्यायाधीशों से चर्चा की जाएगी। अब स्पेशल बेंच यह तय करेगी कि 11 मार्च का फैसला CSE-2025 पर किस तरह और किस सीमा तक लागू होगा।

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