समझौता करो, वरना तबाह कर देंगे :ट्रम्प, 7 महीनों में 10 से ज्यादा बार ईरान को चेतावनी, हर बार बदला रुख
CENTRAL NEWS DESK: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान के बीच पिछले महीनों में तनाव लगातार बढ़ता रहा है। ट्रम्प ने अलग-अलग मौकों पर ईरान को परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय गतिविधियों और अमेरिका के साथ संभावित समझौते को लेकर कड़ी चेतावनियां दीं। कई बार उन्होंने सैन्य कार्रवाई की संभावना का भी संकेत दिया, जबकि बाद में बातचीत और कूटनीतिक समाधान की संभावना पर जोर दिया। इस वजह से उनके बयानों को लेकर ईरान-अमेरिका संबंधों में अनिश्चितता बनी रही।
7 महीनों में 10 से ज्यादा बार चेतावनी
रिपोर्टों और ट्रम्प के सार्वजनिक बयानों में पिछले करीब सात महीनों के दौरान ईरान को कई बार चेतावनी दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इन बयानों का मुख्य संदेश यह रहा कि अगर ईरान परमाणु मुद्दे पर अमेरिका की शर्तों के अनुरूप समझौते की दिशा में आगे नहीं बढ़ता, तो उस पर कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
ट्रम्प ने कुछ मौकों पर सैन्य कार्रवाई की संभावना का संकेत दिया, तो दूसरी ओर बातचीत के जरिए समाधान निकालने की इच्छा भी जताई। यही कारण है कि उनके रुख में बार-बार बदलाव दिखाई दिया।
परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा मुद्दा
अमेरिका और ईरान के बीच विवाद का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका और उसके सहयोगियों को आशंका है कि ईरान की परमाणु गतिविधियां हथियार बनाने की क्षमता की ओर बढ़ सकती हैं। ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
ट्रम्प प्रशासन ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए आर्थिक और राजनीतिक उपायों के साथ सैन्य विकल्प की संभावना भी खुली रखी। इसके जवाब में ईरान ने भी कहा कि वह दबाव में आकर अपनी नीतियां नहीं बदलेगा।
कभी बातचीत, कभी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी
ट्रम्प के बयानों में सबसे बड़ा विरोधाभास यही रहा कि एक तरफ वे ईरान को समझौते के लिए तैयार होने को कहते रहे, वहीं दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई की चेतावनी भी देते रहे। कई मौकों पर ट्रम्प ने कहा कि अगर कूटनीतिक रास्ता सफल होता है तो सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन जब बातचीत में प्रगति नहीं दिखी, तब उन्होंने दोबारा कड़े शब्दों में चेतावनी दी।
इस तरह उनका संदेश broadly दो हिस्सों में रहा समझौते की स्थिति में बातचीत का रास्ता खुला है और समझौता नहीं होने पर दबाव तथा सैन्य विकल्प मौजूद हैं।
ईरान का जवाब भी रहा सख्त
ईरानी नेतृत्व ने अमेरिकी धमकियों को स्वीकार करने के बजाय कई बार जवाबी चेतावनी दी। ईरान का कहना रहा कि वह अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर बाहरी दबाव में फैसला नहीं करेगा। ईरान ने यह भी संकेत दिया कि किसी सैन्य हमले की स्थिति में वह जवाबी कार्रवाई कर सकता है। इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका बनी रही।
हर बार बदला रुख क्यों?
ट्रम्प के बयानों में बदलाव के पीछे कई कारक बताए जाते हैं। इनमें कूटनीतिक बातचीत, ईरान की प्रतिक्रिया, परमाणु गतिविधियों से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय चिंताएं और मध्य पूर्व में व्यापक सुरक्षा स्थिति शामिल हैं।
अमेरिकी प्रशासन के लिए चुनौती यह रही कि ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए सैन्य टकराव को रोकने की कोशिश भी की जाए। दूसरी ओर ईरान के लिए अमेरिका के साथ बातचीत और अपनी परमाणु नीति के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण रहा।
तनाव का असर पूरे मध्य पूर्व पर
ईरान और अमेरिका के बीच टकराव केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व में ईरान के सहयोगी संगठनों और अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगियों के कारण किसी भी बड़े संघर्ष का असर व्यापक हो सकता है। इसी वजह से यूरोपीय देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय पक्षों ने भी कई मौकों पर तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान की जरूरत पर जोर दिया है।
धमकियों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला
ट्रम्प की चेतावनियों के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातचीत की कोशिशें समय-समय पर सामने आती रही हैं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है एक तरफ अधिकतम दबाव की नीति और दूसरी तरफ बातचीत के जरिए समझौते की कोशिश।
आगे क्या होगा?
ईरान-अमेरिका विवाद का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा मुद्दों पर दोनों पक्ष कितनी दूर तक समझौते के लिए तैयार होते हैं। अगर बातचीत आगे बढ़ती है तो तनाव कम हो सकता है, लेकिन यदि कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं तो प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि की संभावना बनी रह सकती है।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
