शाहरुख, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस: क्या महाराष्ट्र FDA के पास है ये अधिकार? जानिए पूरा कानूनी पेच
CENTRAL NEWS DESK: विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर अभिनेता शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ मुश्किल में घिरते नजर आ रहे हैं। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने तीनों अभिनेताओं को शो-कॉज नोटिस जारी कर विज्ञापन में उनकी भूमिका पर जवाब मांगा है। एफडीए का आरोप है कि विमल इलायची के विज्ञापन के जरिए प्रतिबंधित पान मसाला का अप्रत्यक्ष प्रचार यानी सरोगेट विज्ञापन किया जा रहा है। तीनों को अपना लिखित जवाब और संबंधित दस्तावेज जमा करने के लिए 15 दिन का समय दिया गया है।
एफडीए ने किस कानून के तहत भेजा नोटिस?
महाराष्ट्र एफडीए ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 की धारा 24 और 53 का हवाला दिया है। धारा 24 भ्रामक खाद्य विज्ञापनों पर रोक लगाती है, जबकि धारा 53 ऐसे विज्ञापन को प्रकाशित करने या उसके प्रकाशन में पक्ष बनने पर जुर्माने का प्रावधान करती है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, धारा 53 के तहत अधिकतम 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, यह जुर्माना सीधे एफडीए अधिकारी नहीं लगाते। इसके लिए कानून के तहत नियुक्त एडजुडिकेटिंग अधिकारी की प्रक्रिया होती है।
क्या सेलिब्रिटी को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी सवाल है। बॉम्बे हाईकोर्ट के अधिवक्ता संकल्प राजपुरोहित के मुताबिक, कानून में भ्रामक खाद्य विज्ञापन प्रकाशित करने या उसके प्रकाशन में पक्ष बनने वाले व्यक्ति पर कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में एफडीए का अभिनेताओं से जवाब मांगना पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं कहा जा सकता। लेकिन पेच यह है कि फूड सेफ्टी कानून में ब्रांड एंबेसडर या एंडोर्सर की जिम्मेदारी को उतनी स्पष्टता से परिभाषित नहीं किया गया है, जितना कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट में किया गया है। इसलिए इस मामले में अभिनेता को विज्ञापन के लिए सीधे जिम्मेदार मानना अभी एक कानूनी व्याख्या का विषय है।
नोटिस मिलना सजा नहीं है
यह समझना जरूरी है कि तीनों अभिनेताओं को अभी सिर्फ शो-कॉज नोटिस मिला है। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें दोषी घोषित कर दिया गया है। एफडीए उनसे यह जानना चाहता है कि विज्ञापन में उनकी भूमिका क्या थी, विज्ञापन से जुड़े उनके अनुबंध क्या हैं और क्या उन्हें इस बात की जानकारी थी कि यह विज्ञापन प्रतिबंधित उत्पाद के प्रचार के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है। तीनों के जवाब के बाद ही आगे की कार्रवाई की दिशा साफ होगी।
क्या एफडीए सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का आदेश दे सकता है?
नोटिस का यह हिस्सा सबसे ज्यादा कानूनी बहस पैदा कर रहा है। एफडीए ने अभिनेताओं से सोशल मीडिया हैंडल से संबंधित विज्ञापन और प्रमोशनल कंटेंट हटाने को भी कहा है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, एफडीए किसी पोस्ट को हटाने के लिए कह सकता है, लेकिन उसे जबरन हटाने का अधिकार अलग सवाल है। विज्ञापन बंद कराने की स्पष्ट शक्ति कंज्यूमर प्रोटेक्शन कानून के तहत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी सीसीपीए के पास है। वहीं ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने की प्रक्रिया आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत आती है। इसलिए सोशल मीडिया पोस्ट हटाने को लेकर एफडीए का निर्देश कानूनी तौर पर ग्रे जोन में दिखाई देता है।
क्या सिर्फ एफडीए ही कार्रवाई कर सकता है?
नहीं। सरोगेट विज्ञापन से जुड़े मामलों में एक से ज्यादा कानून लागू हो सकते हैं। कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019, सीसीपीए और तंबाकू उत्पादों को नियंत्रित करने वाला सिगरेट्स एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट (कोटपा) अपने-अपने दायरे में कार्रवाई कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि एक एजेंसी के कार्रवाई करने से दूसरी एजेंसी की भूमिका खत्म हो जाती है। अलग-अलग कानूनों के तहत अलग-अलग पहलुओं की जांच संभव है।
एक्सपर्ट का सवाल- पहले विमल से जवाब क्यों नहीं मांगा?
इस मामले में एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर एफडीए का आरोप है कि विमल इलायची का विज्ञापन वास्तव में प्रतिबंधित पान मसाला के प्रचार का जरिया है, तो सबसे पहले कंपनी से जवाब क्यों नहीं मांगा गया सुप्रीम कोर्ट से जुड़े एक अधिवक्ता के मुताबिक, कंपनी ही यह स्पष्ट कर सकती है कि विमल इलायची एक स्वतंत्र उत्पाद के तौर पर किस तरह बेचा और प्रचारित किया जा रहा है।
विज्ञापन में इस्तेमाल ब्रांड नाम, टैगलाइन, पैकेजिंग और विजुअल पहचान जैसे पहलुओं से यह तय करने की कोशिश की जा सकती है कि विज्ञापन वास्तव में सरोगेट प्रमोशन है या नहीं।
महाराष्ट्र में पान मसाला पर पहले से प्रतिबंध
महाराष्ट्र में तंबाकू या निकोटीन वाले गुटखा और पान मसाला उत्पादों पर पहले से प्रतिबंध लागू है। ऐसे में एफडीए की कार्रवाई का मकसद केवल विज्ञापन पर रोक लगाना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी हो सकता है कि प्रतिबंधित उत्पादों का अप्रत्यक्ष प्रचार किस तरह किया जा रहा है। हालांकि, इसी वजह से एक और सवाल उठता है अगर प्रतिबंधित पान मसाला बाजार में उपलब्ध है या उसका प्रचार हो रहा है, तो उसकी बिक्री और सप्लाई पर निगरानी कितनी प्रभावी है?
अब शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को निर्धारित समय में अपना जवाब देना होगा। इसके बाद एफडीए यह तय करेगा कि मामले में आगे कार्रवाई बनती है या नहीं। फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि नोटिस जारी करना और दोष साबित होना दो अलग चीजें हैं। इस मामले में असली कानूनी परीक्षा यह होगी कि एफडीए सरोगेट विज्ञापन के आरोप को किस तरह साबित करता है और क्या फूड सेफ्टी कानून के तहत विज्ञापन में काम करने वाले सेलिब्रिटी को सीधे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यानी विमल इलायची विवाद में असली लड़ाई सिर्फ विज्ञापन की नहीं, बल्कि एफडीए के अधिकार क्षेत्र और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट की कानूनी जिम्मेदारी की भी है।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
