नियम टूटा तो आदेश पर लगेगी रोक: CJI, फॉर्म 6 में बदलाव को मंजूरी नहीं, EC ने कहा था- इजाजत मिली

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CENTRAL NEWS DESK: चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने फिलहाल उन्हें निलंबित करने से इनकार कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ कहा कि केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ अंतरिम कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत पहले चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड देखेगी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि चुनाव आयोग के किसी सदस्य ने निर्धारित प्रक्रिया और सहमति के बिना फैसला लिया है, तो उस फैसले पर रोक लगाई जा सकती है।

फॉर्म-6 को लेकर कोर्ट और चुनाव आयोग की बात अलग-अलग

सुनवाई का सबसे अहम मुद्दा फॉर्म-6 में किए गए बदलाव से जुड़ा रहा। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद चुनाव आयोग की ओर से इस संबंध में अलग पक्ष रखा गया। आयोग ने बताया कि 24 जून 2025 को बिहार में एसआईआर के दौरान फॉर्म-6 के साथ एक घोषणा जोड़ी गई थी। आयोग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के आदेश में इस व्यवस्था को सही ठहराया गया था।

यही अंतर अब विवाद का बड़ा केंद्र बन गया है। सवाल यह है कि फॉर्म-6 के साथ जोड़ी गई घोषणा को वास्तव में अदालत की मंजूरी मिली थी या आयोग ने अदालत के आदेश की अलग व्याख्या की।

एक सदस्य का फैसला पूरे चुनाव आयोग का फैसला नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में फैसले या तो सर्वसम्मति से होने चाहिए या बहुमत के आधार पर।

इसका मतलब यह है कि यदि किसी महत्वपूर्ण मामले में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले फैसला लिया और बाकी चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी, तो उस फैसले की वैधानिकता पर सवाल उठ सकता है।

हालांकि, अदालत ने अभी यह मानने से इनकार किया है कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले लिए थे। इसके लिए रिकॉर्ड देखना जरूरी बताया गया है।

पहले रिकॉर्ड देखेगा कोर्ट, फिर कार्रवाई पर फैसला

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अखबार में छपी कोई भी खबर पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या गलत हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत अब चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित दस्तावेज देखेगी। यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि जरूरी संवैधानिक या कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ था, तो अदालत संबंधित फैसलों पर रोक लगाने या उन्हें वापस लेने पर विचार कर सकती है।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दो याचिकाएं

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो जनहित याचिकाएं दाखिल की गई हैं। पहली याचिका राकेश कुमार सिंह ने दायर की है, जिसमें उन्हें निलंबित करने की मांग की गई है। उनकी ओर से अधिवक्ता विकास सिंह ने दलीलें रखीं। दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई है। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने पक्ष रखा।

दोनों याचिकाओं में एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट सीधे सीईसी को निलंबित कर सकता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था अलग है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव कराने और उसकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसलों की न्यायिक समीक्षा कर सकता है। यदि कोई निर्णय कानून या संविधान के विपरीत पाया जाता है तो अदालत उस पर रोक लगा सकती है या उसे रद्द कर सकती है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे निलंबित करने की अदालत की शक्ति को लेकर अलग संवैधानिक सीमाएं हैं।

मीडिया रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मौजूदा विवाद की शुरुआत एक मीडिया रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी मतभेद सामने आए थे।

रिपोर्ट में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चिंता जताए जाने का उल्लेख किया गया था। इसके बाद चुनाव आयोग के भीतर फैसलों और सहमति की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हुई।

विपक्ष फिर उठा सकता है महाभियोग का मुद्दा

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष पहले भी महाभियोग प्रस्ताव की कोशिश कर चुका है। अप्रैल 2026 में विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था, हालांकि लोकसभा में यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका था। राज्यसभा में इसे लेकर प्रक्रिया लंबित बताई गई थी।

अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे को संसद में उठाने की तैयारी में है।

सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?

अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद कठिन रखी गई है। उन्हें हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। इसके बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।

यही वजह है कि मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को पारित कराना विपक्ष के लिए आसान नहीं माना जा रहा है।

अब अगली सुनवाई पर टिकी नजर

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई अंतरिम निलंबन आदेश नहीं दिया है। अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब और रिकॉर्ड मांगा है।

अब अगली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग एसआईआर से जुड़े फैसलों, फॉर्म-6 में जोड़ी गई घोषणा और तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति को लेकर अदालत के सामने क्या रिकॉर्ड पेश करता है। यदि रिकॉर्ड में प्रक्रिया का उल्लंघन सामने आता है तो चुनाव आयोग के कुछ फैसलों पर न्यायिक कार्रवाई की राह खुल सकती है।

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