सरकारी स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 98 हजार से ज्यादा स्कूलों का आंकड़ा सामने
CENTRAL NEWS DESK: सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए पर्याप्त और इस्तेमाल लायक शौचालय नहीं होने का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंच गया है। सोमवार, 17 अगस्त 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने मामले को उस पीठ के सामने भेजने का निर्देश दिया, जिसने इसी साल मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्कूलों में जरूरी सुविधाओं को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था।
98 हजार से ज्यादा स्कूलों में लड़कियों के लिए इस्तेमाल लायक वॉशरूम नहीं
याचिकाकर्ता रीपक कंसल की ओर से दाखिल जनहित याचिका में केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्ष बनाया गया है। सुनवाई के दौरान वकील ने नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि देश में 98,000 से ज्यादा स्कूलों में लड़कियों के लिए इस्तेमाल लायक वॉशरूम की कमी है। याचिका में मांग की गई है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से रिपोर्ट मंगाकर यह देखा जाए कि स्कूलों में जरूरी सुविधाओं को लेकर पहले दिए गए निर्देशों का कितना पालन हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पहले पुराने फैसले को देखिए
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विस्तृत फैसला दे चुका है। अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से उस फैसले और उसमें दिए गए निर्देशों का अध्ययन करने को कहा। इसके बाद मामले को जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।
जनवरी में आया था ऐतिहासिक फैसला
इस मामले की अहम कड़ी सुप्रीम कोर्ट का 30 जनवरी 2026 का डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार फैसला है। जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा था कि गरिमापूर्ण मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुविधाएं जीवन और शिक्षा के मौलिक अधिकार से जुड़ी हैं। अदालत ने स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और कार्यशील शौचालय, मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन और दूसरी जरूरी सुविधाओं को लेकर राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्देश जारी किए थे।
टॉयलेट की कमी सिर्फ सुविधा नहीं, पढ़ाई से भी जुड़ा मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के फैसले में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन को छात्राओं की गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार से जोड़ा गया था। अदालत ने माना कि जरूरी सुविधाओं की अनुपलब्धता लड़कियों के लिए स्कूल तक समान और बाधारहित पहुंच में रुकावट बन सकती है।
यही वजह है कि मौजूदा याचिका को केवल स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे छात्राओं के स्वास्थ्य, सम्मान और शिक्षा से जुड़े व्यापक अधिकारों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
अब आगे क्या होगा?
मामले की सुनवाई अब जस्टिस पार्डीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने होने की संभावना है। वहां पहले दिए गए निर्देशों के पालन की स्थिति और देशभर के सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए उपलब्ध स्वच्छता सुविधाओं से जुड़े आंकड़ों पर आगे विचार हो सकता है। खासतौर पर 98 हजार से अधिक स्कूलों का आंकड़ा इस मामले में अहम आधार बन सकता है।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
