चीनी की मिठास में छिपा मुनाफे का गणित: 80 रुपए किलो के पीछे कौन कमा रहा सबसे ज्यादा?
CENTRAL NEWS DESK: त्योहारी सीजन से पहले चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने आम लोगों के साथ-साथ गन्ना किसानों की चिंता भी बढ़ा दी है। सरकारी औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई को ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। वहीं, कुछ बाजारों में चीनी ₹70 से ₹80 किलो तक बिकने की खबर है।
सरकार के मुताबिक कीमत बढ़ने के पीछे चीनी उत्पादन में कमी, फसल को नुकसान, त्योहारी मांग, वैश्विक आपूर्ति में कमी और बाजार की अटकलें प्रमुख कारण हैं। दूसरी ओर, किसान संगठनों ने कुछ कारोबारियों और चीनी मिलों पर स्टॉक रोककर कृत्रिम कमी पैदा करने का आरोप लगाया है।
किसानों का सवाल- बढ़ी कीमत का फायदा उन्हें क्यों नहीं?
किसान नेता राजू शेट्टी ने आरोप लगाया है कि चीनी उत्पादकों से जुड़ी कुछ ट्रेडिंग कंपनियों ने कम कीमत पर चीनी खरीदकर स्टॉक रोक लिया और बाद में कीमत बढ़ने पर उसे महंगे दाम पर बेचा।
शेट्टी के मुताबिक जून तक चीनी करीब ₹3,500-₹3,600 प्रति क्विंटल में कारोबार कर रही थी। बाद में कुछ टेंडरों में कीमत करीब ₹6,500 प्रति क्विंटल तक पहुंच गई। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे कारोबारियों को करीब ₹2,200 प्रति क्विंटल का मार्जिन मिला और बड़े पैमाने पर फायदा हुआ।
त्योहारी सीजन से पहले चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने आम लोगों के साथ-साथ गन्ना किसानों की चिंता भी बढ़ा दी है। सरकारी औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई को ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। वहीं, कुछ बाजारों में चीनी ₹70 से ₹80 किलो तक बिकने की खबर है।
सरकार के मुताबिक कीमत बढ़ने के पीछे चीनी उत्पादन में कमी, फसल को नुकसान, त्योहारी मांग, वैश्विक आपूर्ति में कमी और बाजार की अटकलें प्रमुख कारण हैं। दूसरी ओर, किसान संगठनों ने कुछ कारोबारियों और चीनी मिलों पर स्टॉक रोककर कृत्रिम कमी पैदा करने का आरोप लगाया है।
चीनी महंगी, लेकिन गन्ना किसान की कमाई तय
चीनी की खुदरा कीमत बढ़ने का सीधा फायदा गन्ना किसानों को नहीं मिलता। किसानों को आम तौर पर सरकार द्वारा तय फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) या राज्य सरकार की निर्धारित कीमत के आधार पर भुगतान किया जाता है।
इसलिए बाजार में चीनी के दाम अचानक बढ़ने पर भी किसानों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ती। वहीं, जिन मिलों और कारोबारियों के पास पहले से चीनी का स्टॉक मौजूद है, वे बढ़ी कीमत पर बेचकर तत्काल अधिक कमाई कर सकते हैं।
उत्पादन अनुमान से काफी नीचे
सरकार के शुरुआती अनुमान के मुताबिक इस साल चीनी उत्पादन करीब 343 लाख टन रहने की उम्मीद थी। बाद में इसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया। भारत में सामान्य तौर पर सालाना 320 से 340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280 से 290 लाख टन रहती है। महाराष्ट्र के शुगर कमिश्नर संजय कोलते के मुताबिक बारिश और अन्य प्राकृतिक कारणों से गन्ने की फसल प्रभावित हुई, जिससे उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम रहा।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी रेड रॉट बीमारी और अल नीनो जैसे कारणों को कृषि उत्पादन में कमी के लिए जिम्मेदार बताया है।
इथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल कितना जिम्मेदार?
चीनी की कीमत बढ़ने के बीच इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी की मात्रा डायवर्ट किए जाने पर भी सवाल उठे हैं। महाराष्ट्र के अधिकारियों के अनुसार इथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई मात्रा पिछले साल करीब 15 लाख टन से बढ़कर इस साल 18 लाख टन हुई है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि इथेनॉल डायवर्जन मौजूदा कीमत बढ़ोतरी की मुख्य वजह नहीं है। सरकार के अनुसार 2022-23 में चीनी का करीब 12 फीसदी हिस्सा इथेनॉल के लिए इस्तेमाल हुआ था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया।
सरकार का तर्क है कि इथेनॉल उत्पादन अतिरिक्त चीनी को खपाने में मदद करता है और इससे मिलों की आर्थिक स्थिति तथा किसानों के भुगतान में भी मदद मिलती है।
दुनिया में भी चीनी की सप्लाई पर दबाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की आपूर्ति को लेकर दबाव है। 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा करीब 33 लाख टन रहने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत 30 जून को करीब 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन हो गई। यानी करीब दो महीने में 16 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। वैश्विक कीमत बढ़ने से भारत में भी आयात महंगा होता है और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए उठाए कदम
बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट लागू की है। यह सीमा 1 अगस्त से 30 नवंबर तक लागू रहने वाली है। 1 सितंबर से बड़े खरीदारों और थोक उपभोक्ताओं को 15 दिन की जरूरत से ज्यादा चीनी रखने की अनुमति नहीं होगी। सरकार ने मिलों और गोदामों की जांच भी शुरू की है। इसके अलावा घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी गई है। राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है।
सरकार को उम्मीद है कि जल्द पेराई शुरू होने और आयात से अक्टूबर में बाजार में 10 लाख टन से ज्यादा अतिरिक्त चीनी उपलब्ध हो सकती है।
आखिर चीनी की महंगाई से पैसा किसकी जेब में जा रहा?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है। देश में कुल 703 चीनी मिलें हैं, जिनमें 335 निजी, 325 सहकारी और 43 सरकारी मिलें हैं। मौजूदा स्थिति में चीनी के बढ़ते दाम से सबसे तत्काल फायदा उन मिलों और कारोबारियों को हो सकता है, जिनके पास पहले से कम कीमत पर खरीदा या उत्पादित किया गया स्टॉक मौजूद है। वहीं किसानों को बढ़ी हुई खुदरा कीमत का सीधा लाभ नहीं मिलता, क्योंकि गन्ने की कीमत काफी हद तक पहले से निर्धारित होती है।
फिलहाल यह साफ नहीं है कि कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी वास्तविक कमी का नतीजा है या इसमें जमाखोरी और सट्टेबाजी की भी बड़ी भूमिका है। सरकार की ओर से की जा रही मिलों और गोदामों की जांच से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। यानी आम आदमी के लिए चीनी ₹70-80 किलो तक पहुंच गई है, लेकिन असली सवाल अब भी यही है इस बढ़ी हुई कीमत का कितना हिस्सा किसान तक पहुंच रहा है और कितना मिलों व कारोबारियों के मुनाफे में जा रहा है?
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
