मासूमियत पर दरिंदगी का हमला: सख्त कानून के बावजूद क्यों नहीं थम रहे नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म के मामले

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CENTRAL NEWS DESK: देश में नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले रेप और यौन शोषण के मामले केवल अपराध नहीं, बल्कि समाज, कानून और लॉ सिस्टम के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद कानूनों को और अधिक सख्त बनाया गया। बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्सेस एक्ट (पॉक्सो एक्ट) लागू किया गया। फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना हुई, दुष्कर्म के मामलों में सजा बढ़ाई गई और जांच प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने के निर्देश दिए गए। इसके बावजूद नाबालिग बच्चियों के खिलाफ यौन अपराधों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इन इंडिया 2024 रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ 187702 अपराध दर्ज किए गए। यह वर्ष 2023 के 177335 मामलों की तुलना में लगभग 5.8 परसेंट अधिक है। इनमें 69191 मामले पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज हुए, जबकि इन मामलों में 70132 बच्चे पीड़ित पाए गए।

पांच वर्षों में तेजी से बढ़े मामले

यदि पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक दिखाई देती है।

  • 2020 : 128531 मामले
  • 2021 : 149404 मामले
  • 2022 : 162449 मामले
  • 2023 : 177335 मामले
  • 2024 : 187702 मामले

यानी केवल पांच वर्षों में बच्चों के खिलाफ दर्ज अपराधों में 46 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि बताती है कि बच्चों की सुरक्षा आज भी देश के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।

हर दिन 514 बच्चों के खिलाफ अपराध, 190 पॉक्सो मामले

वर्ष 2024 के आंकड़ों का औसत निकाला जाए तो देश में प्रतिदिन लगभग 514 बच्चों के खिलाफ अपराध दर्ज हुए। वहीं केवल पॉक्सो कानून के तहत औसतन 190 मामले प्रतिदिन दर्ज किए गए। यह केवल दर्ज मामलों की संख्या है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक दबाव, बदनामी का डर और पारिवारिक कारणों से बड़ी संख्या में घटनाएं पुलिस तक पहुंच ही नहीं पातीं।

सबसे अधिक चिंता नाबालिग बच्चियों की सुरक्षा को लेकर

पॉक्सो मामलों में दर्ज अधिकांश पीड़ित बच्चियां हैं। पॉक्सो एक्ट की धारा 4 और 6 से जुड़े गंभीर यौन हमलों के 44126 मामलों में 44567 पीड़ित दर्ज किए गए, जिनमें 43675 यानी लगभग 98 प्रतिशत पीड़ित बच्चियां थीं। इससे स्पष्ट होता है कि गंभीर यौन अपराधों का सबसे बड़ा निशाना नाबालिग लड़कियां ही बन रही हैं।

हर पॉक्सो मामला दुष्कर्म नहीं होता

आमतौर पर लोगों को लगता है कि पॉक्सो के सभी मामले दुष्कर्म से जुड़े होते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। इस कानून के तहत दुष्कर्म के अलावा यौन उत्पीड़न, गंभीर यौन हमला, ऑनलाइन यौन शोषण, अश्लील सामग्री दिखाना और बच्चों के साथ अन्य यौन अपराध भी शामिल हैं। इसलिए पॉक्सो मामलों की कुल संख्या और केवल दुष्कर्म के मामलों की संख्या अलग-अलग होती है।

सबसे डराने वाला सच: अजनबी नहीं, अपने ही बन रहे आरोपी

समाज में यह धारणा आम है कि बच्चों के साथ यौन अपराध किसी अजनबी द्वारा किए जाते हैं, लेकिन आंकड़े इससे अलग तस्वीर दिखाते हैं। गंभीर पॉक्सो मामलों में लगभग 97 प्रतिशत मामलों में आरोपी बच्ची का परिचित, रिश्तेदार, पड़ोसी, परिवार का सदस्य, शिक्षक या भरोसेमंद व्यक्ति था। यह तथ्य बताता है कि खतरा घर और आसपास के दायरे में भी मौजूद है।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में सबसे अधिक मामले

एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराधों की संख्या के मामले में महाराष्ट्र में 24171, उत्तर प्रदेश में 22222 और मध्य प्रदेश में 21908 मामले दर्ज हुए। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कुल संख्या के आधार पर राज्यों की तुलना करना उचित नहीं है, क्योंकि जनसंख्या और अपराध दर दोनों को साथ देखकर ही सही तस्वीर सामने आती है।

कम दोष सिद्धि दर क्यों है चिंता का विषय

अपराध दर्ज होना एक चरण है, लेकिन पीड़ित को न्याय मिलना सबसे बड़ी चुनौती है। उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार पॉक्सो मामलों में अदालतों के समक्ष पहुंचे मामलों में बड़ी संख्या अभी भी लंबित है। कई अध्ययनों के अनुसार वर्ष 2024 के अंत तक लगभग 91 प्रतिशत मामलों का निस्तारण नहीं हो पाया था। इससे हजारों परिवार वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

न्याय में देरी के प्रमुख कारण

विशेषज्ञों के अनुसार न्याय मिलने में देरी के पीछे कई कारण हैं

  • पुलिस जांच में देरी।
  • फोरेंसिक रिपोर्ट समय पर न मिलना।
  • गवाहों का मुकर जाना।
  • पीड़ित परिवार पर समझौते का दबाव।
  • विशेष अदालतों और न्यायाधीशों की कमी।
  • बार-बार सुनवाई टलना।
  • डिजिटल और वैज्ञानिक साक्ष्यों के संग्रह में कमी।

इन कारणों से कई मुकदमे वर्षों तक चलते रहते हैं और कई बार आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हो जाते हैं।

क्या केवल सख्त कानून पर्याप्त हैं

निर्भया कांड के बाद कानूनों को कठोर बनाया गया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सजा बढ़ाने से अपराध समाप्त नहीं होते। बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श की जानकारी देना, स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाना, अभिभावकों को संवेदनशील बनाना, पुलिस जांच को वैज्ञानिक बनाना और अदालतों में लंबित मामलों का तेजी से निस्तारण करना उतना ही जरूरी है।

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