सरकारी स्कूलों में हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च, फिर भी क्यों नहीं मिल पा रही हर बच्चे को क्वालिटी एजुकेशन? आंकड़े बताते हैं जमीनी हकीकत
CENTRAL N EWS DESK: अगर किसी देश का भविष्य उसकी स्कूलों की कक्षाओं में तय होता है, तो भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक पर काम कर रहा है। देश में करोड़ों बच्चे हर सुबह सरकारी स्कूलों की ओर कदम बढ़ाते हैं। उनके कंधों पर सिर्फ बस्ता नहीं होता, बल्कि परिवार के बेहतर भविष्य का सपना भी होता है। सरकारें भी इन सपनों को साकार करने के लिए हर साल शिक्षा पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करती हैं। कहीं नए विद्यालय भवन बन रहे हैं, कहीं स्मार्ट कक्षाएं तैयार हो रही हैं, तो कहीं बच्चों को मुफ्त किताबें, वर्दी, मध्याह्न भोजन और डिजिटल शिक्षा की सुविधाएं दी जा रही हैं।
नई नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी लागू होने के बाद शुरुआती कक्षाओं में पढ़ने और मैथ की बुनियादी क्षमता मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। ‘निपुण भारत मिशन’ शुरू किया गया, ‘पीएम श्री विद्यालय’ योजना लाई गई और राज्यों को विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के लिए अतिरिक्त सहायता भी दी गई।

इसके बावजूद एक सवाल आज भी करोड़ों पेरेंट्स, टीचर्स और नीति-निर्माताओं के सामने खड़ा है क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाला हर बच्चा अपनी कक्षा के अनुरूप सीख पा रहा है?
इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है। आधिकारिक रिपोर्टें बताती हैं कि सरकारी स्कूलों में सुविधाएं पहले से बेहतर हुई हैं, लेकिन सीखने की क्वालिटी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जबकि कई मोर्चों पर अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।
दुनिया की सबसे बड़ा एजुकेशन सिस्टम, लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही विशाल
भारत दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली एजुकेशन फेशिलिटीज में शामिल है। एजुकेशन मिनिस्ट्री के वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 14.71 लाख विद्यालय, 24.69 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और एक करोड़ से ज्यादा शिक्षक हैं। इनमें से दस लाख से अधिक विद्यालय सरकारी हैं।
इतनी बड़ी व्यवस्था को चलाना किसी भी देश के लिए आसान नहीं है। यहां केवल भवन बनाना या शिक्षक नियुक्त करना ही पर्याप्त नहीं होता। सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले हर बच्चे तक समान गुणवत्ता वाली शिक्षा पहुंचे।
यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि बच्चों की सीखने की क्षमता मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान देना शुरू किया है।
सरकार शिक्षा पर कितना खर्च कर रही है?
शिक्षा पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर विद्यालयी शिक्षा पर हर वर्ष बड़ी राशि खर्च करती हैं। इस राशि का उपयोग कई योजनाओं के माध्यम से किया जाता है।
इनमें प्रमुख योजनाएं शामिल हैं—
- समग्र शिक्षा अभियान
- पीएम श्री विद्यालय योजना
- निपुण भारत मिशन
- मध्याह्न भोजन (पीएम पोषण) योजना
- मुफ्त पाठ्यपुस्तक और वर्दी वितरण
- डिजिटल शिक्षा और स्मार्ट कक्षाएं
- शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम
इन योजनाओं का उद्देश्य केवल बच्चों को स्कूल तक लाना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना भी है।
लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि खर्च बढ़ना और सीखने का स्तर बढ़ना, दोनों हमेशा एक जैसी गति से नहीं चलते। यदि संसाधनों का प्रभावी उपयोग नहीं हो, शिक्षकों की कमी बनी रहे या पढ़ाने की गुणवत्ता कमजोर हो, तो बड़े बजट का असर भी सीमित रह जाता है।
पहले चुनौती थी बच्चों को स्कूल तक लाना, अब चुनौती है उन्हें सीखाना
करीब दो दशक पहले भारत की सबसे बड़ी समस्या थी कि लाखों बच्चे स्कूल ही नहीं पहुंच पाते थे। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने और विभिन्न सरकारी योजनाओं के बाद इस दिशा में उल्लेखनीय सुधार हुआ। आज अधिकांश बच्चे किसी न किसी विद्यालय में नामांकित हैं। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है।
आज शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बच्चा स्कूल जाता है या नहीं, बल्कि यह है कि वह स्कूल जाकर सीख क्या रहा है।
यही कारण है कि अब शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक चर्चा “सीखने के परिणाम” को लेकर होती है।
कक्षा पांच में पढ़ने वाला बच्चा, लेकिन दूसरी की किताब पढ़ने में कठिनाई
यही वह मुद्दा है जिसने पिछले कुछ वर्षों में नीति-निर्माताओं की चिंता सबसे अधिक बढ़ाई है। देश में ऐसे लाखों बच्चे हैं जो नियमित रूप से स्कूल जाते हैं, परीक्षा भी पास कर लेते हैं और अगली कक्षा में पहुंच जाते हैं, लेकिन जब उनसे उनकी कक्षा से नीचे की किताब पढ़ने या साधारण गणित का सवाल हल करने को कहा जाता है तो वे कठिनाई महसूस करते हैं। विशेषज्ञ इसे “सीखने की खाई” कहते हैं।
यानी बच्चा विद्यालय में तो है, लेकिन उसकी सीखने की गति उसकी कक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ रही। यही समस्या आगे चलकर माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भी दिखाई देती है। कमजोर बुनियाद वाले बच्चों के लिए विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे विषय अधिक कठिन होते चले जाते हैं।
एसर 2024 रिपोर्ट ने राहत भी दी और चेतावनी भी
ग्रामीण भारत में बच्चों की सीखने की क्षमता का आकलन करने वाली एसर 2024 रिपोर्ट ने इस बहस को नई दिशा दी है। रिपोर्ट के अनुसार कोविड महामारी के बाद पहली बार शुरुआती कक्षाओं में पढ़ने और बुनियादी गणित की क्षमता में सुधार दर्ज किया गया है। यह सुधार विशेष रूप से सरकारी स्कूलों में दिखाई दिया है।
विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण बताते हैं
- निपुण भारत मिशन का प्रभाव।
- शुरुआती कक्षाओं पर बढ़ा ध्यान।
- राज्यों द्वारा विशेष सीखने के अभियान।
- शिक्षकों का अतिरिक्त प्रशिक्षण।
- कोविड के बाद नियमित कक्षाओं का संचालन।
हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि सुधार के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे अभी भी अपनी कक्षा के अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं। यानी तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है, लेकिन संतोषजनक भी नहीं कही जा सकती।
सिर्फ भवन बन जाने से शिक्षा बेहतर नहीं हो जाती
पिछले कुछ वर्षों में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदली है। अधिकांश विद्यालयों में अब पक्के भवन, बिजली, पेयजल, अलग शौचालय, पुस्तकालय और रसोईघर जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कई राज्यों में स्मार्ट कक्षाएं और डिजिटल संसाधन भी जोड़े गए हैं। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी विद्यालय की गुणवत्ता केवल उसकी इमारत से तय नहीं होती। अगर-
- शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं,
- कक्षाओं में नियमित पढ़ाई नहीं हो रही,
- बच्चों का समय-समय पर आकलन नहीं हो रहा,
- कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता नहीं मिल रही,
तो केवल भवन और उपकरण शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बदल सकते। यही कारण है कि अब सरकारें भी केवल विद्यालयों की संख्या नहीं, बल्कि बच्चों की सीखने की क्षमता को सफलता का सबसे बड़ा पैमाना मानने लगी हैं।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
