विमेन इंपावरमेंट के दावों के बीच बीड की कड़वी सच्चाई: 16 घंटे की मेहनत, छुट्टी का डर और युटेरस निकलवाने की मजबूरी
CENTRAL NEWS DESK: देश में विमेन इंपावरमेंट, समान अधिकार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की बातें लगातार की जाती हैं, लेकिन महाराष्ट्र के बीड जिले की महिला गन्ना मजदूरों की जिंदगी इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। यहां हजारों महिलाएं रोजी-रोटी की मजबूरी में ऐसे हालात में काम करती हैं, जहां उन्हें अपने हेल्र्थ और फेमिली की इनकम के बीच कठिन फैसला लेना पड़ता है।
हर साल रोजगार के लिए होता है पलायन
बीड जिला लंबे समय से सूखे और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। खेती से पर्याप्त आमदनी नहीं होने के कारण हर वर्ष हजारों परिवार गन्ना कटाई के मौसम में महाराष्ट्र के दूसरे जिलों के अलावा कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की ओर पलायन करते हैं। अधिकांश परिवार पहले ही ठेकेदारों से अग्रिम धनराशि ले लेते हैं। इसके बाद पति-पत्नी को एक श्रम इकाई मानकर खेतों में काम कराया जाता है। यदि दोनों में से कोई एक भी काम नहीं कर पाता, तो पूरे परिवार की कमाई प्रभावित होती है।
सुबह तीन बजे से शुरू होता है दिन, 16 घंटे तक चलता है काम
महिला मजदूरों का दिन सुबह तीन से चार बजे के बीच शुरू हो जाता है। अंधेरा रहते ही वे खेतों में पहुंच जाती हैं। इसके बाद गन्ना काटना, उसे बांधना और 30 से 40 किलोग्राम तक का बोझ सिर पर उठाकर ट्रैक्टर या ट्रक तक पहुंचाना उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या होती है।
सामाजिक संगठनों के अनुसार कई महिलाओं को प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक लगातार काम करना पड़ता है। उन्हें पर्याप्त विश्राम नहीं मिलता और कई जगह स्वच्छ पेयजल, शौचालय तथा स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अभाव है।
बीमारी भी बन जाती है आर्थिक संकट
महिला मजदूरों के सामने सबसे बड़ी परेशानी तब आती है, जब वे पीरिएड्स, युटेरस, बुखार या किसी अन्य बीमारी के कारण काम नहीं कर पातीं। श्रमिक संगठनों का कहना है कि काम रुकने पर मजदूरी कम हो जाती है और कई मामलों में आर्थिक दंड का भी डर बना रहता है। इसी वजह से कई महिलाएं तेज दर्द और खराब स्वास्थ्य के बावजूद लगातार काम करती रहती हैं। उनके लिए एक दिन की छुट्टी का मतलब पूरे परिवार की आय में कमी होता है।
युटेरस निकलवाने का मामला बना चिंता का विषय
वर्ष 2019 में बीड जिला उस समय राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना, जब बड़ी संख्या में महिला गन्ना मजदूरों के युटेरस निकलवाने के मामले सामने आए। जांच में पता चला कि कई महिलाओं ने कम उम्र में ही युटेरस निकलवाया था। आरोप लगे कि लगातार काम करने, पीरिएड्स के दौरान छुट्टी से बचने और मजदूरी प्रभावित न होने देने के दबाव में विमेंस ने यह फैसला लिया। इस घटना ने महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों और श्रमिक सुरक्षा पर देशभर में बहस छेड़ दी।
बढ़ी निगरानी, बिना अनुमति नहीं होगी सर्जरी
संसद में दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2022 से मार्च 2025 तक बीड जिले में 211 गर्भाशय शल्य चिकित्साएं दर्ज की गईं। इनमें वर्ष 2022 में 49, वर्ष 2023 में 89, वर्ष 2024 में 55 और वर्ष 2025 में मार्च तक 18 मामले शामिल हैं। शासन का कहना है कि अब गर्भाशय निकालने की शल्य चिकित्सा केवल चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर और जिला सिविल सर्जन की पूर्व अनुमति के बाद ही की जा सकती है। इसके अलावा 50,158 महिला प्रवासी गन्ना मजदूरों का स्वास्थ्य परीक्षण भी कराया गया है।
सामाजिक संगठनों की चिंता अब भी कायम
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल शल्य चिकित्सा के मामलों में कमी आना पर्याप्त नहीं है। जब तक महिला मजदूरों को सुरक्षित कार्यस्थल, सम्मानजनक मजदूरी, नियमित स्वास्थ्य जांच, मातृत्व सुरक्षा, मासिक धर्म के दौरान आवश्यक सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।
विमेन इंपावरमेंट पर सबसे बड़ा सवाल
आज जब देश विमेन इंपावरमेंट की बात करता है, तब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सशक्तिकरण केवल योजनाओं और भाषणों तक सीमित है? क्या खेतों में दिन-रात मेहनत करने वाली महिला को बीमारी के समय आराम, सुरक्षित कार्यस्थल और सम्मानजनक जीवन का अधिकार नहीं मिलना चाहिए यदि एक महिला अपने स्वास्थ्य से समझौता करके परिवार का पेट पालने को मजबूर है, तो यह केवल श्रम का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
