बांग्लादेश में चुनाव आते ही क्यों बढ़ जाती है सांप्रदायिक हिंसा? रिपोर्ट में सामने आया 2001 से 2014 तक का चौंकाने वाला पैटर्न

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CENTRAL NEWS DESK: बांग्लादेश में हर चुनावी दौर के दौरान सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का आरोप एक बार फिर चर्चा में है। कई मानवाधिकार संगठनों और जांच रिपोर्टों के हवाले से सामने आए तथ्यों में दावा किया गया है कि 2001 से 2014 के बीच लगभग हर बड़े चुनाव या राजनीतिक बदलाव के समय हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर हमले किए गए। रिपोर्टों के अनुसार, इन घटनाओं में घरों में आगजनी, मंदिरों में तोड़फोड़, लूटपाट, महिलाओं के साथ हिंसा और संपत्तियों पर कब्जे जैसी घटनाएं सामने आईं।

विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी माहौल में होने वाली इस तरह की हिंसा कोई संयोग नहीं, बल्कि एक ऐसा पैटर्न बन चुका है जो बार-बार दोहराया गया।

2001 के आम चुनाव के बाद शुरू हुई हिंसा की बड़ी लहर

रिपोर्ट के मुताबिक 1 अक्टूबर 2001 को हुए आठवें संसदीय चुनाव में बीएनपी-जमात गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत मिला। चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद बांग्लादेश के कई जिलों—भोला, बारीसाल, बागरहाट, ब्राह्मणबाड़िया, चिटगांव, फेनी समेत कई इलाकों में हिंदू समुदाय पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू हो गए। रिपोर्ट में कहा गया कि हमलावरों ने हिंदू परिवारों की संपत्तियों को निशाना बनाया, घरों में आग लगाई और लोगों को डराकर भारत की ओर पलायन करने के लिए मजबूर करने की कोशिश की।

सरकारी जांच आयोग ने 25 हजार लोगों की भूमिका का किया जिक्र

इन घटनाओं की जांच के लिए बांग्लादेश सरकार ने एक आयोग का गठन किया था। करीब 9 वर्षों तक चली जांच के बाद आयोग ने 1,078 पन्नों की रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंपी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि लगभग 25 हजार लोगों की भूमिका सामने आई, जिनमें तत्कालीन सरकार के 25 मंत्री और सांसद भी शामिल थे। आयोग ने कहा कि हिंसा के पीछे राजनीतिक विचारधारा, सांप्रदायिक सोच और उस समय की प्रशासनिक कमजोरियां जिम्मेदार थीं। हालांकि, बीएनपी ने इस रिपोर्ट को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया था।

2013 में फिर भड़की सांप्रदायिक हिंसा

रिपोर्ट के अनुसार 28 फरवरी 2013 को अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने जमात-ए-इस्लामी के नेता देलवार हुसैन सईदी को 1971 के युद्ध अपराधों में मौत की सजा सुनाई। इसके तुरंत बाद जमात ने देशव्यापी बंद का आह्वान किया। आरोप है कि इस दौरान जमात और उसकी छात्र इकाई इस्लामी छात्र शिबिर के कार्यकर्ताओं ने कई जिलों में हिंदू समुदाय पर हमले किए। घरों में आग लगाई गई, मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया और संपत्तियों में लूटपाट हुई।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी नोआखाली और कोमिल्ला समेत कई इलाकों में हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा था कि पीड़ितों ने हमलावरों की पहचान जमात समर्थकों के रूप में की थी।

2014 के चुनाव से पहले फिर दोहराया गया हमला

जनवरी 2014 के आम चुनाव से पहले भी हिंसा की घटनाएं सामने आईं। रिपोर्ट के मुताबिक, जेसोर जिले के मालोपारा गांव में करीब 250 से 300 लोगों की भीड़ ने हिंदू समुदाय के घरों पर हमला किया। करीब 130 मकानों में तोड़फोड़ की गई और कई घरों में आग लगा दी गई। ग्रामीणों को जान बचाने के लिए भैरब नदी पार कर भागना पड़ा। इस मामले में सात लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

मानवाधिकार संगठनों ने बताया लगातार दोहराया जाने वाला पैटर्न

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बांग्लादेश में चुनाव, राजनीतिक बदलाव या धार्मिक विवाद के समय हिंदू समुदाय पर हमले बार-बार सामने आते रहे हैं।

इन हमलों में आमतौर पर

  • घरों में आगजनी
  • मंदिरों में तोड़फोड़
  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा
  • संपत्तियों की लूट
  • आर्थिक नुकसान पहुंचाना

जैसी घटनाएं शामिल रही हैं।

रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि अधिकांश मामलों में दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से भविष्य में ऐसी घटनाओं को बढ़ावा मिला।

जांच रिपोर्टों में कार्रवाई की कमी पर भी सवाल

सरकारी आयोग की विस्तृत रिपोर्ट के बावजूद सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के आरोप में किसी बड़े राजनीतिक नेता को विशेष रूप से दोषी ठहराकर सजा मिलने के मामले बेहद सीमित रहे। 2013 और 2014 की घटनाओं में कुछ गिरफ्तारियां जरूर हुईं, लेकिन कई मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि हिंसा के संगठित स्वरूप पर पर्याप्त कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकी।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी जताई थी चिंता

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2014 के चुनावी हिंसा पर जारी अपनी रिपोर्ट में विपक्षी समर्थकों द्वारा की गई हिंसा के साथ-साथ सुरक्षा बलों की कार्रवाई का भी उल्लेख किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि कई इलाकों में हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया और राजनीतिक हिंसा ने व्यापक सामाजिक तनाव पैदा किया।

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