ब्रिटेन में 35°C और भारत में 45°C: आखिर यूके की गर्मी ज्यादा क्यों सताती है? जानिए इसकी वैज्ञानिक वजह

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ब्रिटेन में भीषण हीटवेव के बीच लंदन के टॉवर ब्रिज के पास साउथ बैंक पर एक व्यक्ति तेज धूप से राहत पाने के लिए लेटा हुआ है। बढ़ते तापमान को देखते हुए यूके के कई हिस्सों में एम्बर हीट हेल्थ अलर्ट जारी किया गया है। (फोटो: रॉयटर्स)

CENTRAL NEWS DESK: ब्रिटेन समेत पश्चिमी यूरोप के कई देशों में इन दिनों भीषण गर्मी ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। गुरुवार को ब्रिटेन और स्विट्जरलैंड ने जून महीने का अब तक का सबसे गर्म दिन दर्ज किया। तेज गर्मी के कारण कई इलाकों में बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई, स्कूल बंद करने पड़े और कई ऐतिहासिक स्मारकों को भी अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया।

ब्रिटेन में तापमान लगभग 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। दूसरी ओर भारत के कई राज्यों में हर साल 45 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान सामान्य बात मानी जाती है। इसके बावजूद ब्रिटेन के लोग 35°C की गर्मी को बेहद असहनीय बता रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर भारत की 45°C गर्मी की तुलना में ब्रिटेन की 35°C गर्मी अधिक परेशान क्यों करती है?


केवल तापमान नहीं, नमी भी बनती है बड़ी वजह

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी जगह गर्मी का असर केवल तापमान पर निर्भर नहीं करता, बल्कि हवा में मौजूद नमी यानी ह्यूमिडिटी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ब्रिटेन चारों ओर समुद्रों से घिरा हुआ देश है। इसी वजह से वहां की हवा में नमी अधिक रहती है। गर्म दिनों में लंदन जैसे शहरों में सापेक्षिक आर्द्रता (रिलेटिव ह्यूमिडिटी) 40 प्रतिशत या उससे अधिक पहुंच जाती है। वहीं स्पेन या भारत के कई शुष्क इलाकों में इतनी ही गर्मी के दौरान नमी काफी कम रहती है।

जब हवा में नमी अधिक होती है तो शरीर से निकलने वाला पसीना आसानी से सूख नहीं पाता। पसीना वाष्पित नहीं होने से शरीर प्राकृतिक रूप से ठंडा नहीं हो पाता और व्यक्ति को अधिक गर्मी महसूस होती है।


शरीर की ठंडक प्रणाली क्यों हो जाती है कमजोर

मानव शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है। लेकिन पसीना तभी प्रभावी होता है जब वह त्वचा से उड़कर वातावरण में मिल जाए। ब्रिटेन जैसी अधिक नमी वाली जगहों पर हवा पहले से ही नमी से भरी रहती है। ऐसे में पसीना सूखने में अधिक समय लेता है। परिणामस्वरूप शरीर के अंदर गर्मी जमा होने लगती है।

इस स्थिति में लोगों को कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जिनमें शामिल हैं

  • हीट एग्जॉशन यानी अत्यधिक गर्मी से थकावट
  • डिहाइड्रेशन
  • हृदय संबंधी समस्याएं
  • सांस लेने में दिक्कत
  • बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए अतिरिक्त जोखिम

वेट बल्ब टेम्परेचर क्या होता है?

मौसम विशेषज्ञ केवल सामान्य तापमान नहीं देखते, बल्कि वेट बल्ब टेम्परेचर का भी इस्तेमाल करते हैं। इसमें तापमान और हवा की नमी दोनों को मिलाकर यह आंका जाता है कि इंसानी शरीर पर गर्मी का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा। ब्रिटेन की मौजूदा हीटवेव के दौरान दक्षिणी इंग्लैंड में वेट बल्ब टेम्परेचर लगभग 25 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है। यह स्तर बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों के लिए स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। सूखे इलाकों में इसी तरह का प्रभाव पैदा करने के लिए सामान्य तापमान को 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाना पड़ता है।


ब्रिटेन के घर गर्मी को और बढ़ा देते हैं

विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिटेन की आवास व्यवस्था भी वहां की गर्मी को अधिक असहनीय बना देती है। ब्रिटेन के अधिकांश घर ठंडी और लंबी सर्दियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। मोटी ईंटों की दीवारें, टाइल वाली छतें और कंक्रीट की संरचनाएं दिनभर गर्मी को अपने अंदर जमा कर लेती हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ती रहती हैं। वैज्ञानिक इन्हें थर्मल बैटरी की तरह बताते हैं, जो दिन की गर्मी को लंबे समय तक घरों के भीतर बनाए रखती हैं।


एयर कंडीशनर की कमी भी बड़ी समस्या

भारत, खाड़ी देशों और दुनिया के कई गर्म क्षेत्रों में एयर कंडीशनर सामान्य सुविधा बन चुके हैं। इसके विपरीत ब्रिटेन में अधिकांश घरों में आज भी एयर कंडीशनर नहीं लगे हैं, क्योंकि वहां पहले इतनी अधिक गर्मी नहीं पड़ती थी। इसलिए हीटवेव आने पर लोगों के पास घरों को ठंडा रखने के सीमित साधन ही उपलब्ध रहते हैं।


भारत में लोग गर्मी के अनुरूप ढल चुके हैं

भारत में लोग दशकों से भीषण गर्मी का सामना करते आए हैं। इसलिए यहां के घर और जीवनशैली दोनों मौसम के अनुसार विकसित हुए हैं।

भारतीय घरों में अक्सर

  • मोटी दीवारें
  • खुले आंगन
  • बेहतर प्राकृतिक वेंटिलेशन
  • छायादार संरचनाएं
  • गर्म दोपहर में कम गतिविधियां

जैसी व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं, जो गर्मी का असर कम करने में मदद करती हैं।


अचानक आने वाली हीटवेव भी बनती है कारण

भारत में गर्मी धीरे-धीरे बढ़ती है। मार्च से तापमान बढ़ना शुरू होता है और मई-जून तक चरम पर पहुंचता है। इस दौरान शरीर भी मौसम के अनुसार खुद को ढाल लेता है। लेकिन ब्रिटेन में मौसम अचानक बदल जाता है। कुछ सप्ताह पहले तक ठंड और बारिश रहने के बाद अचानक तापमान 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। शरीर को खुद को अनुकूल बनाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।


लंबे दिन भी बढ़ाते हैं गर्मी

ब्रिटेन में जून और जुलाई के दौरान दिन काफी लंबे होते हैं। देर शाम तक तेज धूप रहने के कारण सड़कें, इमारतें और कंक्रीट लगातार गर्मी सोखते रहते हैं। सूरज ढलने के बाद भी यही गर्मी धीरे-धीरे वातावरण में निकलती रहती है, जिससे रात का तापमान अपेक्षा से अधिक बना रहता है।


ट्रॉपिकल नाइट्स क्यों बन रही हैं चिंता

जब रात का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जाता, तो उसे ट्रॉपिकल नाइट कहा जाता है। ऐसी रातों में शरीर दिनभर की गर्मी से पूरी तरह उबर नहीं पाता। लगातार कई दिनों तक ऐसा होने पर हीट स्ट्रेस और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा काफी बढ़ जाता है।


शहरों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का असर

बड़े शहरों में कंक्रीट, डामर और ऊंची इमारतें गर्मी को लंबे समय तक रोककर रखती हैं। इसे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है। लंदन जैसे शहरों में रात के समय भी तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में कई डिग्री अधिक बना रहता है। अधिक नमी के साथ यह स्थिति लोगों के लिए और भी कठिन हो जाती है।


जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में हीटवेव पहले की तुलना में अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में आ रही हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ब्रिटेन की इमारतें, सार्वजनिक ढांचा और दैनिक जीवन अभी भी ठंडे मौसम के अनुरूप बने हुए हैं। यही कारण है कि वहां 35 डिग्री सेल्सियस की गर्मी भी लोगों को भारत की 45 डिग्री सेल्सियस गर्मी से अधिक परेशान करने लगती है।

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