मानसून पर ब्रेक! 20 दिन से थमी बारिश, आखिर क्यों रुक गई देशभर में मॉनसून की स्पीड
CENTRAL NEWS DESK: समय से पहले दस्तक देने वाला साऊथ-वेस्ट मानसून जून के मिड में अचानक सुस्त पड़ गया। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे सिर्फ अल नीनो नहीं, बल्कि कई ग्लोबल और रिजनल मौसमीय कारकों का संयुक्त असर जिम्मेदार है। भारत में हर साल मानसून करोड़ों लोगों की जिंदगी, खेती और फाइनेंशियल व्यवस्था प्रभावित करता है। इस बार मानसून ने उम्मीद से पहले देश में प्रवेश कर शानदार शुरुआत की थी। जून के पहले सप्ताह में कई इलाकों में अच्छी बारिश दर्ज हुई और लगा कि इस बार मानसून तेजी से पूरे देश को कवर कर लेगा। लेकिन कुछ ही दिनों बाद इसकी रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई। जिसके चलते कई राज्यों में बारिश की कमी दर्ज होने लगी और किसानों की चिंता बढ़ गई।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति सामान्य नहीं है, लेकिन इसके पीछे कोई एक कारण भी नहीं है। इस बार मानसून कई अलग-अलग मौसमी घटनाओं के दबाव में आ गया, जिससे उसका आगे बढ़ना लगभग रुक गया।
शुरुआत शानदार, फिर अचानक थम गई मानसून की चाल
दक्षिण-पश्चिम मानसून ने जून की शुरुआत में तेजी से आगे बढ़ते हुए कई राज्यों को कवर कर लिया था। आमतौर पर मानसून को आगे बढ़ाने में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली नमी वाली हवाओं की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन इस बार शुरुआती बढ़त के बाद मानसून को वह समर्थन नहीं मिल पाया जिसकी उसे जरूरत थी। बारिश का दायरा सिमटने लगा और कई हिस्सों में बादल तो दिखाई दिए, लेकिन अपेक्षित वर्षा नहीं हुई। इससे देश के कई क्षेत्रों में वर्षा का घाटा बढ़ने लगा।

सिर्फ अल नीनो नहीं, कई सिस्टम बने वजह
अक्सर मानसून कमजोर पड़ने पर सबसे पहले अल नीनो का नाम सामने आता है। अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाला एक मौसमीय बदलाव है, जो दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करता है। भारत में यह आमतौर पर मानसून को कमजोर करने के लिए जाना जाता है। हालांकि इस बार वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल अल नीनो को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। इसके साथ कई अन्य मौसमी कारकों ने भी मानसून की प्रगति को प्रभावित किया।
विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में विकसित हो रहे मौसमीय सिस्टमों ने मानसूनी ऊर्जा का एक हिस्सा अपनी ओर खींच लिया। इससे बंगाल की खाड़ी में वह अनुकूल माहौल नहीं बन पाया, जो आमतौर पर बारिश बढ़ाने वाले निम्न दबाव क्षेत्रों के निर्माण में मदद करता है।
पश्चिमी विक्षोभ बने बड़ी बाधा
मानसून की रफ्तार थमने की एक बड़ी वजह लगातार सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ भी रहे। ये सिस्टम सामान्यतः सर्दियों में ज्यादा प्रभावी होते हैं, लेकिन इस बार जून में भी इनकी सक्रियता देखने को मिली। पश्चिमी विक्षोभों ने उत्तर भारत में शुष्क हवाओं को बढ़ावा दिया। इन हवाओं ने वातावरण में मौजूद नमी को कमजोर किया और बादलों के विकास को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप व्यापक बारिश की संभावना कम हो गई। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ये सिस्टम इतने सक्रिय नहीं होते तो मानसून कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ सकता था।
बंगाल की खाड़ी में नहीं बना मजबूत निम्न दबाव क्षेत्र
मानसून की प्रगति के लिए बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यही सिस्टम नमी को अंदरूनी इलाकों तक पहुंचाते हैं और बारिश को बढ़ावा देते हैं। लेकिन इस बार बंगाल की खाड़ी में ऐसा कोई मजबूत निम्न दबाव क्षेत्र विकसित नहीं हो पाया। इसके कारण मानसूनी हवाओं को आवश्यक ऊर्जा नहीं मिली और बारिश का सिलसिला कमजोर पड़ गया। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि हवाओं का प्रवाह भी सामान्य पैटर्न से अलग रहा। नमी वाली हवाएं एक दिशा में बहती रहीं, जबकि निम्न दबाव क्षेत्र बनने के लिए हवाओं का आपस में टकराना और घूमना जरूरी होता है।
एमजेओ का भी नहीं मिला साथ
मौसम विज्ञान में मैडन-जूलियन ऑसिलेशन यानी एमजेओ को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह एक ऐसा वैश्विक मौसमीय चक्र है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादल और बारिश की गतिविधियों को प्रभावित करता है। जून के पहले दो सप्ताह में एमजेओ मानसून के लिए अनुकूल स्थिति में नहीं था। इसकी वजह से हिंद महासागर क्षेत्र में बादलों का विकास सीमित रहा और संवहन की प्रक्रिया कमजोर पड़ी। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एमजेओ सक्रिय होता तो मानसून को अतिरिक्त ऊर्जा मिल सकती थी और बारिश की स्थिति बेहतर रहती।
किसानों और जल प्रबंधन एजेंसियों की बढ़ी चिंता
मानसून की सुस्ती का सबसे ज्यादा असर खेती पर पड़ता है। देश के कई हिस्सों में खरीफ फसलों की बुआई बारिश पर निर्भर करती है। बारिश कम होने से किसान चिंतित हैं कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो फसलों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा जलाशयों में पानी का स्तर बढ़ने की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। कई राज्यों में सिंचाई और पेयजल व्यवस्था के लिए मानसून की अच्छी बारिश बेहद जरूरी होती है। हालांकि विशेषज्ञ अभी किसी बड़े संकट की आशंका नहीं जता रहे हैं, क्योंकि मानसून का मुख्य सीजन अभी बाकी है।
जून के आखिरी सप्ताह में राहत की उम्मीद
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाले दिनों में स्थिति बदल सकती है। अनुमान है कि जून के अंतिम सप्ताह में एमजेओ अनुकूल चरण में प्रवेश करेगा। साथ ही भूमध्य रेखा पार से आने वाली नमी वाली हवाएं और लो-लेवल जेट भी मजबूत होंगे। यदि ऐसा होता है तो मानसून को नई ताकत मिलेगी और बारिश की गतिविधियां तेजी से बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई की शुरुआत तक देश के कई हिस्सों में मानसून फिर से सक्रिय रूप में दिखाई दे सकता है।
मानसून रुका है, कमजोर नहीं पड़ा
मौसम विभाग का कहना है कि मौजूदा स्थिति को मानसून की विफलता नहीं माना जाना चाहिए। यह केवल एक अस्थायी ठहराव है, जो कई मौसमीय कारणों से पैदा हुआ है। जैसे ही अनुकूल परिस्थितियां बनेंगी, मानसून फिर से गति पकड़ सकता है। फिलहाल देशभर की निगाहें जून के अंतिम सप्ताह पर टिकी हैं। यदि मौसम वैज्ञानिकों के अनुमान सही साबित होते हैं तो जल्द ही बारिश की गतिविधियां बढ़ेंगी और मानसून एक बार फिर पूरे देश में अपनी रफ्तार दिखाएगा।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
