भारत पर टिका नेपाल, फिर क्यों बढ़ रहा ‘भंसार’ विवाद?
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CENTRAL NEWS DESK (अवनीश मिश्रा): भारत औप नेपाल का रिलेशन सिर्फ दो पड़ोसी देशों का नहीं है। यह रिलेशन सदियों पुराना है, जिसमें कल्चर, इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट, खान-पान, एम्प्लायमेंट और लोगों की जिंदगी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। लेकिन पिछले कुछ समय से नेपाल में “भंसार” यानी बॉर्डर टैक्स और कस्टम को लेकर जो सख्ती देखने को मिल रही है, उसने दोनों देशों के रिलेशन में कड़वाहट घोलने का काम किया है।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जिस भारत के सहारे नेपाल का बाजार चलता है, जहां से नेपाल की रसोई से लेकर वेहिकल्स का पहिया तक घूमता है, उसी भारत के व्यापारियों और सामानों पर नेपाल बार-बार सख्ती क्यों दिखा रहा है?
नेपाल की जिंदगी की डोर भारत से क्यों जुड़ी है?
नेपाल की जियोग्राफिकल स्थिति ही ऐसी है कि वह पूरी तरह जमीन से घिरा हुआ देश है। समुद्र तक उसकी कोई सीधी पहुंच नहीं है। दुनिया के दूसरे देशों से व्यापार करने के लिए भी उसे भारत के रास्तों और भारतीय बंदरगाहों का सहारा लेना पड़ता है। यही वजह है कि नेपाल की अर्थव्यवस्था की असली धुरी भारत ही माना जाता है।
नेपाल के बाजारों में रोज इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर चीजें भारत से जाती हैं। सुबह की चाय में घुलने वाली चीनी हो, घरों में पकने वाला चावल और गेहूं हो, दालें हों, दवाइयां हों या फिर पेट्रोल-डीजल नेपाल का बड़ा हिस्सा भारतीय सप्लाई पर निर्भर है।
अनाज से लेकर चीनी तक, नेपाल की रसोई भारत के भरोसे
जब भी भारत घरेलू जरूरतों की वजह से चीनी, चावल या दूसरे अनाजों के निर्यात पर थोड़ी भी रोक लगाता है, नेपाल के बाजारों में अफरा-तफरी मच जाती है। वहां महंगाई तेजी से बढ़ती है और जरूरी सामानों की कमी महसूस होने लगती है। इससे साफ समझ आता है कि नेपाल की खाद्य सुरक्षा काफी हद तक भारत के भरोसे चल रही है। नेपाल के लिए भारत सिर्फ एक पड़ोसी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा खाद्य आपूर्तिकर्ता भी है। भारतीय खेतों से निकला अनाज सीधे नेपाली बाजारों तक पहुंचता है और वहां की आम जनता की जरूरतें पूरी करता है।
पेट्रोल-डीजल बंद हुआ तो रुक जाएगा नेपाल
ईंधन के मामले में नेपाल की निर्भरता और भी ज्यादा है। नेपाल के पास अपनी कोई रिफाइनरी नहीं है। वहां इस्तेमाल होने वाला लगभग पूरा पेट्रोल और डीजल भारत से जाता है। इसी जरूरत को देखते हुए दोनों देशों के बीच रक्सौल-अमलेखगंज पाइपलाइन बनाई गई थी, जिसे दक्षिण एशिया की पहली सीमा-पार पेट्रोलियम पाइपलाइन कहा जाता है।
इस पाइपलाइन ने नेपाल के लिए ईंधन पहुंचाना आसान और सस्ता बना दिया। नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन को इससे हर महीने करोड़ों नेपाली रुपये की बचत होने लगी। अगर किसी दिन भारत ईंधन की सप्लाई रोक दे, तो नेपाल की सड़कें और उद्योग कुछ ही दिनों में ठप पड़ सकते हैं।
दुनिया से जुड़ने के लिए भी भारत जरूरी
नेपाल की अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक व्यवस्था भी भारत के सहारे ही चलती है। समुद्र न होने की वजह से नेपाल दुनिया के दूसरे देशों से आयात-निर्यात करने के लिए भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल करता है। कोलकाता, हल्दिया और विशाखापट्टनम जैसे बंदरगाह नेपाल के लिए जीवनरेखा की तरह हैं।
भारत-नेपाल ट्रांजिट संधि के तहत नेपाल को भारतीय रास्तों और रेल नेटवर्क का इस्तेमाल करने की सुविधा मिली हुई है। यानी नेपाल दुनिया से जुड़ने के लिए भी भारत पर ही निर्भर है।
बिजली परियोजनाओं में भी भारत सबसे बड़ा साझेदार
सिर्फ व्यापार ही नहीं, नेपाल में होने वाला बड़ा विदेशी निवेश भी भारत से आता है। भारतीय कंपनियां नेपाल में बिजली परियोजनाओं, सड़कों और बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश कर रही हैं। SJVN नेपाल का बड़ा जलविद्युत प्रोजेक्ट अरुण-३ बना रही है। वहीं GMR और NHPC भी कई बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रही हैं।
इन परियोजनाओं के जरिए नेपाल भविष्य में बिजली उत्पादन बढ़ाकर भारत को बिजली बेचकर कमाई भी कर सकेगा। यानी नेपाल के ऊर्जा भविष्य में भी भारत की बड़ी भूमिका है।

लाखों नेपाली नागरिकों की कमाई का जरिया है भारत
भारत और नेपाल के रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत खुली सीमा है। १९५० की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि के तहत नेपाली नागरिकों को भारत में रहने, नौकरी करने और व्यापार करने की खुली छूट मिली हुई है।
लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और वहां से भेजा गया पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था का बड़ा सहारा बनता है। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्ते सिर्फ सरकारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी से सीधे जुड़े हुए हैं।
फिर क्यों बढ़ रहा है ‘भंसार’ विवाद?
इसके बावजूद नेपाल में समय-समय पर भारत विरोधी माहौल बनाने की कोशिशें होती रही हैं। कई बार घरेलू राजनीति के दबाव में या बाहरी प्रभावों के कारण नेपाल सरकार भारत से आने वाले सामानों और वाहनों पर “भंसार” के नाम पर सख्ती बढ़ा देती है।
भारतीय व्यापारियों से अतिरिक्त शुल्क वसूला जाता है, सीमा पर जांच बढ़ाई जाती है और कई नए नियम लागू कर दिए जाते हैं। इससे दोनों countries के बीच व्यापारिक रिश्तों में तनाव पैदा होता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि नेपाल की राजनीति में भारत विरोध एक आसान राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। कई बार चीन के बढ़ते प्रभाव को भी इसकी बड़ी वजह माना जाता है।
भूगोल ही नेपाल की सबसे बड़ी मजबूरी
नेपाल कोशिश करता है कि वह भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर चले, लेकिन जमीन की सच्चाई यही है कि नेपाल की रोजमर्रा की जरूरतें आज भी सबसे ज्यादा भारत से ही पूरी होती हैं।
चीन के साथ हिमालयी रास्तों से बड़े स्तर पर व्यापार करना बेहद महंगा और मुश्किल है, जबकि भारत के साथ खुली सीमा, आसान सड़क संपर्क, सांस्कृतिक समानता और सस्ता परिवहन नेपाल को स्वाभाविक फायदा देता है।
यही कारण है कि चाहे राजनीतिक बयानबाजी कितनी भी हो जाए, नेपाल की अर्थव्यवस्था की असली धड़कन आज भी भारत से ही चलती है।
रिश्तों में टकराव नहीं, भरोसे की जरूरत
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नेपाल की अर्थव्यवस्था, व्यापार, ईंधन, खाद्य सुरक्षा और रोजगार तक भारत से जुड़े हुए हैं, तो फिर “भंसार” के जरिए भारत के साथ रिश्तों में कड़वाहट पैदा करने का फायदा आखिर किसे मिलेगा?
हकीकत यही है कि अगर भारत हाथ खींच ले, तो नेपाल के बाजारों से लेकर सड़कों तक उसका असर साफ दिखाई देने लगेगा। इसलिए दोनों देशों के लिए सबसे जरूरी चीज टकराव नहीं, बल्कि भरोसे और सहयोग के रिश्ते को मजबूत बनाए रखना है।
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