नेपाल में आई जलप्रलय की पूरी कहानी सामने आई! सैटेलाइट तस्वीरों ने बताया कहां से टूटा पहाड़
नेपाल के रसुवा में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड को लेकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की अहम शाखा ने बड़ा आकलन किया है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए उस घटनाक्रम को समझने की कोशिश की है, जिसने कुछ ही समय में पहाड़ी इलाकों में भारी तबाही मचा दी। शुरुआती विश्लेषण में सर्क ग्लेशियर के एक हिस्से के ढहने, बर्फ-चट्टानों के हिमस्खलन और नदी के रास्ते में अस्थायी रुकावट के बाद अचानक सैलाब आने की आशंका जताई गई है।
CENTRAL NEWS DESK: नेपाल के रसुवा इलाके में आई अचानक बाढ़ ने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान हिमालय की तरफ खींच दिया है। गांवों, सड़कों, पुलों और बुनियादी ढांचे को तबाह करने वाले इस सैलाब के पीछे आखिर क्या हुआ? इसका जवाब तलाशने में भारत की अंतरिक्ष तकनीक अहम भूमिका निभा रही है।
भारत के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) ने अंतरराष्ट्रीय और भारतीय सैटेलाइट तस्वीरों का अध्ययन कर आपदा से पहले और बाद के हालात की तुलना की है। इस विश्लेषण से वैज्ञानिकों को न केवल तबाही का दायरा समझने में मदद मिली, बल्कि सैलाब के संभावित घटनाक्रम की तस्वीर भी सामने आई है।

सैटेलाइट ने दिखाई तबाही की पूरी तस्वीर
एनआरएससी ने आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों को मिलाकर प्रभावित इलाके का जियोस्पेशियल असेसमेंट किया। वैज्ञानिकों ने 24 अगस्त को यूरोप के सेंटिनल-2 सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों की तुलना 26 अगस्त को इसरो के रिसोर्ससैट-2ए से प्राप्त तस्वीरों से की। इसके अलावा 4 अप्रैल 2026 की रिसोर्ससैट-2ए की पुरानी तस्वीरों को भी देखा गया। इससे वैज्ञानिक यह समझ सके कि बाढ़ के बाद नदी का रास्ता, आसपास की जमीन और मलबे का फैलाव किस तरह बदल गया। इमेजेस में नदी के रास्ते में बड़े बदलाव और कई स्थानों पर भारी मात्रा में मलबा जमा होने के संकेत मिले हैं।

आखिर कहां से शुरू हुई तबाही?
एनआरएससी के शुरुआती आकलन के मुताबिक, आपदा की शुरुआत तिब्बत के ऊंचे पहाड़ी इलाके में हुई हो सकती है। वैज्ञानिकों ने संभावना जताई है कि एक सर्क ग्लेशियर का हिस्सा अचानक ढह गया। सर्क ग्लेशियर पहाड़ की ढलान पर कटोरे जैसी आकृति वाले हिस्से में बनने वाला ग्लेशियर होता है। जब इसका कोई बड़ा हिस्सा टूटता है तो उसके साथ भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानें नीचे की ओर गिर सकती हैं।
यही प्रक्रिया यहां भी हुई होने की आशंका है।
बर्फ और चट्टानों ने बनाया ‘मौत का सैलाब’
ग्लेशियर का हिस्सा टूटने के बाद बर्फ और चट्टानों का विशाल मलबा तेजी से पहाड़ी घाटी की ओर नीचे आया। माना जा रहा है कि इस मलबे ने कुछ समय के लिए नदी के बहाव को रोक दिया। इससे पानी एक जगह जमा होने लगा और अस्थायी जलाशय जैसी स्थिति बन गई। लेकिन जैसे ही यह प्राकृतिक रुकावट टूटी, जमा पानी अपने साथ कीचड़, बर्फ, चट्टान और मलबा लेकर बेहद तेज रफ्तार से नीचे की तरफ बह निकला। यही सैलाब आगे जाकर त्रिशूली नदी प्रणाली में पहुंचा और निचले इलाकों में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई।

क्या भूकंप ने ग्लेशियर को हिलाया?
इस आपदा के समय हिमालयी क्षेत्र में भूकंप भी दर्ज किया गया था। भारत के नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के मुताबिक, सुबह करीब 8:22 बजे 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। इसकी गहराई करीब 10 किलोमीटर बताई गई और इसका स्थान रसुवा क्षेत्र में था। हिमालय पहले से ही भूकंपीय गतिविधियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे में भूकंप और ग्लेशियर की अस्थिरता के बीच संबंध की संभावना को भी विशेषज्ञों की नजर से देखा जा रहा है। हालांकि, ग्लेशियर के ढहने और बाढ़ के बीच सटीक कारण-क्रम को पूरी तरह स्थापित करने के लिए अभी और वैज्ञानिक जांच की जरूरत है।
सैटेलाइट तस्वीरों से क्या पता चला?
सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना में नदी के आसपास बड़े पैमाने पर बदलाव दिखाई दिए हैं। बाढ़ के साथ बहकर आए मलबे ने नदी के कई हिस्सों को प्रभावित किया। कई जगह जमीन की सतह और नदी का रास्ता बदलता हुआ दिखाई दिया। आपदा के बाद की तस्वीरों से वैज्ञानिकों को यह पहचानने में मदद मिली कि पानी और मलबा किन इलाकों तक पहुंचा। इस तरह सैटेलाइट तकनीक ने उन दुर्गम पहाड़ी इलाकों का आकलन करने में मदद की, जहां जमीन के रास्ते तुरंत पहुंचना बेहद मुश्किल है।
सर्क ग्लेशियर क्या होता है?
सर्क ग्लेशियर पहाड़ों पर कटोरे जैसी आकृति वाले प्राकृतिक गड्ढों में बनता है। इन स्थानों पर लंबे समय तक बर्फ और हिम जमा होते रहते हैं। ऊंची पहाड़ी ढलानों से आने वाली बर्फ और हिमस्खलन भी इन ग्लेशियरों में जमा होते रहते हैं। लेकिन जब किसी प्राकृतिक या भू-वैज्ञानिक कारण से ग्लेशियर का संतुलन बिगड़ता है, तो इसका बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर सकता है। अगर इसके रास्ते में नदी या कोई घाटी हो तो बर्फ और चट्टानों का यह मलबा पानी के बहाव को रोक सकता है। इसके बाद रुकावट टूटने पर अचानक बेहद तेज सैलाब पैदा हो सकता है।

एक घटना कैसे बनी इतनी बड़ी आपदा?
शुरुआती वैज्ञानिक आकलन को समझें तो घटनाओं की एक पूरी चेन रिएक्शन सामने आती है। ग्लेशियर का हिस्सा ढहा, बर्फ और चट्टानों का हिमस्खलन हुआ, नदी का रास्ता कुछ समय के लिए रुका, पानी जमा हुआ, प्राकृतिक रुकावट टूटी, पानी और मलबे का विशाल सैलाब नीचे आया। यानी पहाड़ के ऊपरी हिस्से में शुरू हुई एक स्थानीय घटना कुछ ही समय में नदी की दिशा में कई किलोमीटर दूर तक तबाही फैलाने वाली आपदा में बदल गई।
आपदा प्रबंधन में सैटेलाइट है अहम
नेपाल की इस घटना ने एक बार फिर साबित किया है कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में अंतरिक्ष तकनीक कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। सैटेलाइट के जरिए किसी आपदा से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना की जा सकती है। इससे प्रभावित क्षेत्र, बदले हुए नदी मार्ग, भूस्खलन और मलबे के फैलाव का तेजी से पता लगाया जा सकता है।
खासकर हिमालय जैसे दुर्गम इलाकों में, जहां राहत और बचाव दलों का पहुंचना मुश्किल होता है, वहां सैटेलाइट तस्वीरें प्रशासन और वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा सकती हैं।
हिमालय में बढ़ती ऐसी घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
रसुवा की घटना ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को फिर सामने ला दिया है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों में बदलाव, तेजी से बदलता पहाड़ी भूगोल और मानवीय गतिविधियों के बीच इन घटनाओं को लेकर वैज्ञानिक लगातार अध्ययन कर रहे हैं। फिलहाल रसुवा आपदा के मामले में एनआरएससी का आकलन शुरुआती वैज्ञानिक तस्वीर पेश करता है। अंतिम निष्कर्ष के लिए जमीन पर जांच, और अधिक सैटेलाइट डेटा तथा अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों की जरूरत होगी।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
