तेजी से गर्म हो रहा हिमालय, सदी के अंत तक 6.71 डिग्री तक बढ़ सकता है तापमान

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CENTRAL NEWS DESK: हिमालय में तेजी से बढ़ता तापमान आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती बन सकता है। एक नए अध्ययन के मुताबिक सदी के अंत तक हिमालय के औसत तापमान में 6.71 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है। अध्ययन में पश्चिमी हिमालय को सबसे तेजी से गर्म होने वाला क्षेत्र बताया गया है, जबकि मध्य हिमालय यानी मुख्य रूप से उत्तराखंड में भी रात का तापमान दिन की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है।

बीआइटी मेसरा, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे और अशोका विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने 1901 से 2020 तक के 120 वर्षों के तापमान आंकड़ों और आठ वैश्विक जलवायु मॉडलों का विश्लेषण किया। शोध 9 जून 2026 को Journal of Earth System Science में प्रकाशित हुआ है।

दिन से ज्यादा तेजी से गर्म हो रही हैं रातें

अध्ययन के अनुसार 1901-1930 को आधार मानने पर हाल के दो दशकों में सर्दियों के दौरान पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिमालय में तापमान क्रमशः 1.06, 0.96 और 1.09 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है।

मध्य हिमालय में सर्दियों की रातों का न्यूनतम तापमान करीब 1.20 डिग्री बढ़ा, जबकि दिन का अधिकतम तापमान 0.72 डिग्री बढ़ा। पश्चिमी हिमालय में रात का तापमान 1.23 और दिन का 0.87 डिग्री बढ़ा।

गर्म रातों से बर्फ पिघलने का चक्र बदलेगा

विज्ञानियों के मुताबिक रातों का ज्यादा गर्म होना हिमालय के लिए गंभीर संकेत है। सामान्य तौर पर ठंडी रातों में दिन के दौरान पिघली बर्फ दोबारा जम जाती है। लेकिन रातों के गर्म होने से बर्फ का पुनर्जमाव कम होगा।

इससे बर्फ पिघलने की अवधि और नदियों तक पानी पहुंचने का चक्र बदल सकता है। सर्दियों में कम बर्फ जमा होने से गर्मियों के लिए प्राकृतिक जल भंडार भी घट सकता है।

2100 तक पश्चिमी हिमालय की सर्दियां 7.18 डिग्री गर्म हो सकती हैं

सबसे अधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2081-2100 के दौरान शुरुआती 1900 के मुकाबले पश्चिमी हिमालय की सर्दियां 7.18 डिग्री, मध्य हिमालय की 6.71 डिग्री और पूर्वी हिमालय की 5.82 डिग्री तक गर्म हो सकती हैं।

वसंत ऋतु में भी पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिमालय में क्रमशः 6.91, 6.41 और 5.16 डिग्री तक तापमान बढ़ने का अनुमान है।

हालांकि, कम उत्सर्जन की स्थिति में पश्चिमी हिमालय की सर्दियों में तापमान वृद्धि करीब 2.55 डिग्री तक सीमित रह सकती है।

बर्फबारी में भी बड़ी कमी का अनुमान

अध्ययन में पश्चिमी हिमालय में वसंत के दौरान बर्फ की मात्रा में सदी के अंत तक बड़ी कमी का अनुमान लगाया गया है। अधिक उत्सर्जन की स्थिति में यह कमी करीब 95.9 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर तक पहुंच सकती है। मध्य हिमालय में सदी के अंत तक 17.0 से 34.9 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर और पूर्वी हिमालय में 5.5 से 11.1 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर तक बर्फ की कमी का अनुमान है।

1.5 अरब लोगों पर पड़ेगा असर

अध्ययन में हिमालय के 15 हजार से अधिक ग्लेशियरों और सिंधु, गंगा व ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियों पर संभावित प्रभाव को रेखांकित किया गया है। इन नदी प्रणालियों पर करीब 1.5 अरब लोग निर्भर हैं। पूर्वी हिमालय में बर्फ का नुकसान अपेक्षाकृत कम रहने का अनुमान है, लेकिन वहां ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ यानी GLOF का खतरा प्रमुख है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से नई झीलें बनने के कारण यह जोखिम भविष्य में और बढ़ सकता है।

क्षेत्रवार जलवायु नीति की जरूरत

विज्ञानियों ने हिमालय के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग जलवायु रणनीति बनाने की जरूरत बताई है। इसके साथ जमीनी और सैटेलाइट निगरानी, बेहतर जलवायु मॉडल, पूर्व चेतावनी प्रणाली, टिकाऊ जल प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की तैयारी बढ़ाने की सिफारिश की गई है। अध्ययन के अनुसार अगले दो-तीन दशकों में तापमान बढ़ने का रुझान विभिन्न मॉडलों में काफी हद तक समान है, लेकिन सदी के अंत तक तापमान कितना बढ़ेगा, यह मुख्य रूप से भविष्य में होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर निर्भर करेगा।

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