जहां हिंसा हो, वहां समझौता नहीं समाधान जरूरी, पारिवारिक विवाद में मध्यस्थता को लेकर जस्टिस नागरत्ना की अहम टिप्पणी
CENTRAL NEWS DESK : पारिवारिक विवादों को बातचीत और समझौते के जरिए सुलझाने के लिए मध्यस्थता को एक प्रभावी तरीका माना जाता है, लेकिन हर मामले में यह प्रक्रिया सही नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने ऐसे मामलों में सावधानी बरतने की जरूरत बताई है, खासकर तब जब विवाद में हिंसा, जबरदस्ती नियंत्रण या परिवार के भीतर शक्ति का गंभीर असंतुलन मौजूद हो।
हिंसा वाले मामलों में मध्यस्थता पड़ सकती है भारी
गुवाहाटी में सुप्रीम कोर्ट की फैमिली कोर्ट से जुड़ी समिति के क्षेत्रीय सम्मेलन में जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हिंसा झेल रही महिलाओं को केवल समझौते की प्रक्रिया में भेजना कई बार उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है।
उनके मुताबिक, जहां महिला पहले से ही हिंसा या दबाव का सामना कर रही हो और परिवार में उसके पास अपनी बात मजबूती से रखने की स्थिति न हो, वहां मध्यस्थता का फायदा मिलने के बजाय मानसिक प्रताड़ना बढ़ने का खतरा रहता है।
हर विवाद में समझौता ही रास्ता नहीं
जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि मध्यस्थता अदालत के न्यायिक फैसले का विकल्प नहीं बन सकती। किसी भी समझौते की प्रक्रिया में यह देखना जरूरी है कि दोनों पक्ष अपनी इच्छा से बातचीत कर पा रहे हैं या नहीं। उन्होंने खास तौर पर महिलाओं की मोल-भाव करने की क्षमता को उनके कानूनी अधिकारों जितना ही महत्वपूर्ण बताया। यानी सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि महिला को कानून क्या अधिकार देता है, बल्कि यह भी जरूरी है कि वह उन अधिकारों के लिए स्वतंत्र रूप से अपनी बात रख पाने की स्थिति में है या नहीं।
मध्यस्थता के कई फायदे भी गिनाए
जस्टिस नागरत्ना ने मध्यस्थता की उपयोगिता को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने बताया कि पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता के जरिए कई मामलों का अपेक्षाकृत तेजी से समाधान हो सकता है। इस प्रक्रिया में निजी बातचीत और गोपनीयता बनी रहती है। महिलाओं को स्त्रीधन की वापसी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और आर्थिक भुगतान से जुड़े मामलों में भी आपसी सहमति बनाने का मौका मिल सकता है।
लेकिन उन्होंने साफ किया कि ये फायदे उन मामलों में सीमित हो जाते हैं, जहां हिंसा या जबरदस्ती का माहौल मौजूद हो।
बच्चों की कस्टडी पर भी दिया नया सुझाव
जस्टिस नागरत्ना ने बच्चों की कस्टडी और माता-पिता के मुलाकात के अधिकारों से जुड़े विवादों पर भी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि सिर्फ यह तय करने के बजाय कि बच्चे की कस्टडी किसे मिलेगी, पेरेंटिंग प्लान पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
इसमें यह तय किया जा सकता है कि अलग रह रहे माता-पिता बच्चे की देखभाल, पढ़ाई और मुलाकात जैसी जिम्मेदारियों को किस तरह निभाएंगे। उन्होंने ऐसे मामलों में योग्य चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की सलाह को भी उपयोगी बताया।
फैमिली कोर्ट पर भी उठे सवाल
जस्टिस नागरत्ना ने फैमिली कोर्ट की मौजूदा स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट बनाए जाने का उद्देश्य पारिवारिक विवादों में कानूनी लड़ाई को बढ़ाना नहीं था, बल्कि लोगों को विवादों का जल्द और प्रभावी समाधान उपलब्ध कराना था।
हालांकि, लंबित मामलों की बड़ी संख्या के कारण कई फैमिली कोर्ट व्यवहार में सिविल कोर्ट की तरह काम करते नजर आ रहे हैं। इससे मामलों के निपटारे में देरी होती है, जबकि पारिवारिक विवादों में पक्षकार अक्सर जल्द समाधान चाहते हैं।
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी का मुख्य संदेश
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी का केंद्र यह है कि मध्यस्थता हर पारिवारिक विवाद के लिए एक जैसा समाधान नहीं हो सकती। जहां दोनों पक्ष बराबरी की स्थिति में बातचीत कर सकते हैं, वहां यह प्रक्रिया उपयोगी हो सकती है। लेकिन हिंसा, दबाव और गंभीर शक्ति असंतुलन वाले मामलों में महिला की सुरक्षा और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को प्राथमिकता देना जरूरी है।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
