दाखिला मिल गया… अब बताओ, रहोगे कहां? 72 हजार स्टूडेंट्स के शहर में हॉस्टल की जगह हजारों के लिए भी नहीं

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CENTRAL NEWS DESK: दिल्ली में पढ़ाई का सपना लेकर आने वाले हजारों युवाओं के सामने अब सिर्फ कॉलेज, कोर्स और करियर का सवाल नहीं है। सबसे बड़ा सवाल है कि रहेंगे कहां और कितने सुरक्षित रहेंगे?

दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, आईआईटी दिल्ली और दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में हर साल बड़ी संख्या में छात्र दाखिला लेते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों के हॉस्टल में जगह सीमित होने के कारण बड़ी आबादी को निजी पीजी, किराये के कमरे और शेयर्ड फ्लैट का सहारा लेना पड़ता है। यहीं से शुरू होती है दिल्ली की असली स्टूडेंट हाउसिंग क्राइसिस महंगा किराया, छोटे कमरे, ज्यादा छात्र और कई जगहों पर सुरक्षा के सवाल।

डीयू में 72 हजार से ज्यादा दाखिले, हॉस्टल की सीटें हजारों में

दिल्ली विश्वविद्यालय में 2025-26 सत्र में 72,230 स्नातक दाखिले हुए, जबकि स्वीकृत सीटों की संख्या 71,624 थी। इतनी बड़ी छात्र संख्या के मुकाबले विश्वविद्यालय के हॉस्टल में उपलब्ध जगह बेहद कम है। मतलब साफ है कि कॉलेज में दाखिला मिल गया, लेकिन रहने की जगह मिलना अलग जंग है।

दिल्ली के कई कॉलेजों में हॉस्टल की मांग उपलब्ध क्षमता से पांच से छह गुना तक ज्यादा होने की बात सरकारी योजना रिपोर्टों में सामने आ चुकी है। खासकर बाहर से आने वाले छात्रों और छात्राओं के लिए यह समस्या ज्यादा बड़ी है।

जेएनयू में 5,500 की क्षमता, जामिया में करीब 4,120

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में करीब 18 हॉस्टल हैं, जिनकी कुल क्षमता 5,500 छात्रों की है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक हॉस्टल की सुविधा सीमित है और दाखिला मिलने का मतलब हॉस्टल मिलना नहीं है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में लड़कों और लड़कियों के हॉस्टल की कुल क्षमता करीब 4,120 है। वहीं दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में लड़कों और लड़कियों के लिए कुल मिलाकर करीब 2,623 हॉस्टल सीटें हैं। यानी बड़े संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या और हॉस्टल की क्षमता के बीच बड़ा गैप है।

हॉस्टल नहीं मिला तो पीजी ही सहारा

हॉस्टल में जगह नहीं मिली तो छात्रों का अगला पड़ाव होता है पीजी, किराये का कमरा या शेयर्ड फ्लैट। मुखर्जी नगर, पुराना राजेंद्र नगर, करोलबाग, लक्ष्मी नगर, कटवरिया सराय और सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में छात्र निजी आवासों में रहते हैं। इन इलाकों में पढ़ाई के साथ रहने का खर्च भी छात्रों के बजट पर भारी पड़ता है। कई छात्र खर्च कम करने के लिए एक कमरे में दो से चार लोगों तक के साथ रहते हैं। जेन-ज़ी के लिए यह सिर्फ ‘रूम’ नहीं है। यही उनका पढ़ने का कमरा, सोने की जगह, खाना खाने की जगह और कई बार पूरा दिन बिताने वाला स्पेस होता है।

असली डर किराये का नहीं, सुरक्षा का है

महंगा किराया एक समस्या है, लेकिन उससे बड़ा सवाल सुरक्षित आवास का है। किसी पीजी की इमारत कितनी पुरानी है? बिजली की वायरिंग कैसी है? आग लगने पर बाहर निकलने का रास्ता है या नहीं? बेसमेंट में पानी तो नहीं भर रहा? इमारत में जरूरत से ज्यादा लोग तो नहीं रह रहे? निर्माण नियमों के मुताबिक हुआ है या नहीं? इन सवालों के जवाब अक्सर हादसे के बाद तलाशे जाते हैं।

सत्य निकेतन हादसे ने फिर खोल दी सुरक्षा की पोल

सत्य निकेतन में छात्रावास के तौर पर इस्तेमाल हो रही बहुमंजिला इमारत के ढहने की घटना ने छात्रों के निजी आवास की सुरक्षा पर फिर बहस छेड़ दी है। हादसे के बाद इमारत की उम्र, बेसमेंट में पानी, निर्माण कार्य और अवैध निर्माण जैसे पहलुओं की जांच हुई। मलबे में फंसे एक युवक की मदद की गुहार वाला वीडियो भी सामने आया, जिसने हादसे की भयावहता को और सामने ला दिया। यह सवाल अब सिर्फ सत्य निकेतन का नहीं है। सवाल यह है कि दिल्ली के दूसरे स्टूडेंट पीजी कितने सुरक्षित हैं?

तीन साल में 1,133 इमारतें ढहीं, 98 लोगों की मौत

दिल्ली में इमारतों की सुरक्षा को लेकर आंकड़े भी परेशान करने वाले हैं। 2022 से 2025 के बीच राजधानी में 1,133 इमारत ढहने की घटनाएं दर्ज हुईं और इनमें 98 लोगों की मौत हुई। जब राजधानी में इतनी बड़ी संख्या में इमारतें ढह रही हों, तब छात्र बहुल इलाकों में बने निजी पीजी और हॉस्टल की नियमित जांच का सवाल और गंभीर हो जाता है।

अवैध निर्माण के 76 हजार से ज्यादा मामले

2015 से 17 मार्च 2025 के बीच एमसीडी के 12 जोन में 76,465 अवैध निर्माण के मामले दर्ज किए गए। इनमें से 35,842 मामलों में कार्रवाई शुरू की गई। यह आंकड़ा बताता है कि अवैध निर्माण की समस्या छोटी नहीं है। और जब पुराने मकानों को तेजी से पीजी या हॉस्टल में बदला जाता है, तब सवाल सिर्फ नक्शे और मंजिलों का नहीं रहता। सवाल सीधे छात्रों की जिंदगी से जुड़ जाता है।

हादसे के बाद छात्रों का गुस्सा भी दिखा

सत्य निकेतन हादसे के बाद एमसीडी की कार्यप्रणाली के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन किया। एबीवीपी से जुड़े करीब 150 से 200 छात्रों ने नागरिक केंद्र में विरोध जताया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच धक्का-मुक्की हुई और करीब 15 छात्रों को हिरासत में लिया गया। छात्रों का सवाल सीधा था अगर अवैध और असुरक्षित निर्माण की जानकारी पहले से है, तो हादसे का इंतजार क्यों किया जा रहा है.

दिल्ली से कोटा तक एक ही कहानी

यह संकट सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। राजस्थान का कोटा देश का बड़ा प्रतियोगी परीक्षा केंद्र है। नीट और जेईई की तैयारी के लिए देशभर से छात्र यहां पहुंचते हैं। छात्रों की संख्या बढ़ने के साथ हॉस्टल, पीजी और किराये के कमरों की मांग भी बढ़ती है। लेकिन छात्रों का दबाव सिर्फ कमरे की चार दीवारों तक सीमित नहीं है। पढ़ाई का दबाव, आर्थिक तनाव, परिवार की उम्मीदें, अकेलापन और भविष्य को लेकर चिंता भी उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।

देश में हर साल हजारों छात्र आत्महत्या करते हैं

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में देश में 13,892 छात्र आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। 2022 में यह आंकड़ा 13,044 था। हालांकि किसी भी आत्महत्या के पीछे सिर्फ पढ़ाई का दबाव जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। सरकारी आंकड़ों में पारिवारिक समस्या, आर्थिक परेशानी, मानसिक स्वास्थ्य, करियर और पेशे से जुड़ी परेशानियां, अकेलापन समेत कई कारण सामने आते हैं।

इसलिए छात्र सुरक्षा का मतलब सिर्फ मजबूत इमारत नहीं है। सुरक्षित माहौल, उचित आवास, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जरूरत के समय मदद मिलना भी उतना ही जरूरी है।

‘कॉलेज मिल गया’ के बाद शुरू होती है असली दिल्ली वाली जंग

दिल्ली आने वाले छात्रों के लिए कहानी अक्सर ऐसी होती है, दाखिला मिल गया, कोर्स मिल गया, अब हॉस्टल मिलेगा?, नहीं मिला तो पीजी खोजो।
पीजी महंगा है तो कमरा शेयर करो, कमरा मिल गया तो देखो इमारत सुरक्षित है या नहीं यानी शिक्षा व्यवस्था में छात्र के लिए सीट तय है, लेकिन सुरक्षित छत की गारंटी अभी भी सवाल है।

सवाल सिर्फ कमरे का नहीं, जिंदगी का है

दिल्ली को देश की शिक्षा राजधानी कहा जाता है। लेकिन अगर यहां आने वाले छात्रों को पढ़ाई के साथ सुरक्षित और किफायती आवास के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह सिर्फ छात्रों की व्यक्तिगत परेशानी नहीं है। यह शहर की योजना और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल है। क्योंकि कॉलेज में दाखिले की सीट बढ़ाना जरूरी है, लेकिन उस सीट पर बैठने वाले छात्र के सिर पर सुरक्षित छत होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

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