सख्त कानून, फिर भी इंसाफ का लंबा इंतजार: आखिर क्यों नहीं थम रहे नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म के मामले?
देश में नाबालिग बच्चियों के साथ यौन अपराधों की बढ़ती संख्या जितनी चिंता पैदा करती है, उससे कहीं अधिक गंभीर स्थिति इन मामलों में न्याय मिलने की है। अपराध दर्ज होने के बाद पीड़ित परिवारों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। कई मामलों में फैसला आने से पहले ही गवाह मुकर जाते हैं, पीड़ित परिवार समझौते के दबाव में आ जाता है या फिर जांच में हुई छोटी-सी चूक आरोपी को कानून का लाभ दिला देती है।
राष्ट्रीय स्तर पर अदालतों में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) के अनुसार देश की विभिन्न अदालतों में लगभग 4.99 करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें 3.86 करोड़ से अधिक आपराधिक मामले हैं। यह स्थिति बताती है कि न्यायपालिका पर कितना अधिक दबाव है और इसका असर पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई पर भी पड़ता है।
पॉक्सो मामलों में लंबित मुकदमे सबसे बड़ी चिंता
बच्चों के अधिकारों पर काम करने वाले संस्थानों के विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2024 के अंत तक अदालतों में पहुंचे लगभग 91 प्रतिशत पॉक्सो मामलों का निस्तारण नहीं हो पाया था। यानी हर 100 मामलों में केवल 9 मामलों का ही फैसला हो सका, जबकि शेष मामलों में पीड़ित परिवार न्याय का इंतजार करता रहा।
दोष सिद्धि दर अब भी बेहद कम
पॉक्सो मामलों में राष्ट्रीय स्तर पर दोष सिद्धि दर लगभग 19 प्रतिशत दर्ज की गई। इसका अर्थ है कि अदालतों में जिन मामलों का फैसला हुआ, उनमें हर 100 मामलों में औसतन केवल 19 मामलों में आरोपी दोषी साबित हुए। शेष मामलों में आरोपी बरी हुए, साक्ष्य पर्याप्त नहीं मिले या अन्य कानूनी कारणों से दोष सिद्ध नहीं हो सका।
विशेषज्ञों का कहना है कि कम दोष सिद्धि दर का अर्थ यह नहीं है कि सभी आरोपी निर्दोष थे। कई मामलों में पुलिस जांच की कमियां, वैज्ञानिक साक्ष्यों का अभाव, गवाहों का मुकर जाना और सुनवाई में वर्षों की देरी न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।
उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लंबित मामले
देश में लंबित पॉक्सो मामलों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। उपलब्ध न्यायिक विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत तक उत्तर प्रदेश में लगभग 40228 पॉक्सो मामले लंबित थे। यह देश के कुल लंबित पॉक्सो मामलों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि राज्य में मामलों के निस्तारण की गति पहले की तुलना में बेहतर हुई है, लेकिन लंबित मामलों का बोझ अब भी बहुत अधिक है।
क्यों होती है आखिर जांच और सुनवाई में देरी
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं
- पुलिस जांच समय पर पूरी नहीं हो पाती।
- फोरेंसिक प्रयोगशालाओं से रिपोर्ट आने में कई महीने लग जाते हैं।
- पीड़ित और गवाहों पर दबाव बनाया जाता है।
- विशेष पॉक्सो अदालतों और न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त नहीं है।
- सरकारी वकीलों पर अत्यधिक कार्यभार रहता है।
- कई जिलों में वीडियो गवाही और बाल अनुकूल अदालतों की व्यवस्था अभी भी सीमित है।
इन कारणों से कई मुकदमे पांच से दस वर्ष तक चलते रहते हैं।
सबसे बड़ा खतरा घर और परिचितों से
यौन अपराधों को लेकर आम धारणा यह है कि आरोपी कोई अजनबी होगा, लेकिन उपलब्ध विश्लेषण इससे अलग तस्वीर दिखाते हैं। गंभीर पॉक्सो मामलों में अधिकांश आरोपी पीड़ित बच्ची के परिचित, रिश्तेदार, पड़ोसी, परिवार के सदस्य, शिक्षक या भरोसेमंद व्यक्ति पाए गए। यही कारण है कि कई मामलों में परिवार शिकायत दर्ज कराने से भी हिचकिचाता है।
क्या केवल कठोर कानून काफी हैं
निर्भया कांड के बाद कानूनों में कई बड़े बदलाव हुए। पॉक्सो कानून को और प्रभावी बनाया गया। गंभीर मामलों में कठोर सजा और कुछ परिस्थितियों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया गया। इसके बावजूद अपराध पूरी तरह नहीं रुके।
बाल अधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि कानून अपराध होने के बाद कार्रवाई करता है, जबकि अपराध रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता, बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श की जानकारी, स्कूलों में नियमित प्रशिक्षण, अभिभावकों की सतर्कता और डिजिटल सुरक्षा पर समान रूप से काम करना होगा।
Avneesh Mishra is a young and energetic journalist. He keeps a keen eye on sports, politics and foreign affairs. Avneesh has done Post Graduate Diploma in TV Journalism.
