पाकिस्तान का सबसे बड़ा झूठ बेनकाब! पानी के संकट के लिए भारत को दोषी ठहराया, लेकिन हकीकत ने खोली पोल

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CENTRAL NEWS DESK: भीषण गर्मी और बढ़ते जल संकट के बीच पाकिस्तान एक बार फिर भारत पर सिंधु जल संधि को लेकर आरोप लगा रहा है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर पानी रोक दिया है, जिसकी वजह से देश में पानी का संकट गहरा गया है। हालांकि, उपलब्ध तथ्य और आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान का जल संकट भारत की वजह से नहीं, बल्कि उसकी अपनी दशकों पुरानी नीतिगत विफलताओं, खराब जल प्रबंधन और राजनीतिक लापरवाही का नतीजा है।

हाल ही में पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जिसमें भारत पर पानी रोकने का आरोप लगाया गया। लेकिन इस अभियान को वैश्विक स्तर पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। यहां तक कि विश्व बैंक, जिसने वर्ष 1960 में सिंधु जल संधि कराने में अहम भूमिका निभाई थी, उसने भी इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला

भारत ने वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। इस आतंकी हमले में 25 निर्दोष पर्यटकों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि आतंकवाद और सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार कह चुके हैं कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।”

क्या है सिंधु जल संधि?

वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का पानी भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों के जल उपयोग का अधिकार पाकिस्तान को दिया गया। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति दी गई थी।

भारत ने नहीं रोका पाकिस्तान का पानी

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल भारत के पास ऐसी कोई बड़ी संरचना नहीं है, जिससे वह पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक सके। भारत अभी भी अपने हिस्से का काफी पानी पूरी तरह उपयोग नहीं कर पा रहा है और वर्षों से अतिरिक्त पानी पाकिस्तान की ओर बहता रहा है।

अब भारत शाहपुर कंडी बांध, चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना समेत कई योजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है ताकि अपने हिस्से के पानी का बेहतर उपयोग किया जा सके। इन परियोजनाओं का उद्देश्य पाकिस्तान का पानी रोकना नहीं बल्कि भारत के हिस्से के पानी का उपयोग बढ़ाना है।

पाकिस्तान ने खुद बढ़ाया अपना संकट

जल विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान ने दशकों तक जल संरक्षण और जल भंडारण की अनदेखी की। वहां बड़े बांध और जलाशय नहीं बनाए गए। इसके चलते हर गर्मी में पानी की कमी गंभीर रूप ले लेती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान सरकार ने पिछले दो वर्षों में जल परियोजनाओं के बजट में लगातार भारी कटौती की। वर्ष 2025-26 में जल परियोजनाओं का बजट लगभग 27 प्रतिशत घटा दिया गया, जबकि अगले वर्ष इसमें फिर लगभग 42 प्रतिशत की कमी कर दी गई।

अधूरे पड़े हैं हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट

रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान में जल परियोजनाओं का लगभग 1.27 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये का काम अधूरा पड़ा हुआ है। वर्षों से इन परियोजनाओं को पूरा नहीं किया गया, जिससे देश की जल भंडारण क्षमता लगातार कमजोर होती चली गई।

बर्बाद होता रहा पानी

पूर्व भारतीय सिंधु जल आयुक्त प्रदीप कुमार सक्सेना के अनुसार पाकिस्तान हर साल भारी मात्रा में पानी बिना उपयोग किए समुद्र में बहा देता है। जितना पानी पाकिस्तान समुद्र में गंवा देता है, वह लगभग भारत के पूरे हिस्से के बराबर माना जाता है।

जल संरक्षण नहीं, पानी की बर्बादी

पाकिस्तान दुनिया के सबसे अधिक जल संकट वाले देशों में शामिल होने के बावजूद धान, गन्ना, गेहूं और कपास जैसी अत्यधिक पानी मांगने वाली फसलों की खेती बड़े पैमाने पर करता है। इसके अलावा भूजल का भी अंधाधुंध दोहन किया गया, जिससे कई इलाकों में जल स्तर तेजी से नीचे चला गया।

बांधों की क्षमता भी हुई आधी

पाकिस्तान का सबसे बड़ा तरबेला बांध भी अब गाद भरने की समस्या से जूझ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार उसकी जल भंडारण क्षमता लगभग 48 प्रतिशत तक घट चुकी है। वर्ष 1976 के बाद पाकिस्तान ने कोई बड़ा जलाशय तैयार नहीं किया।

अपने ही प्रांतों में पानी को लेकर विवाद

जल संकट का एक बड़ा कारण पाकिस्तान के प्रांतों के बीच पानी का विवाद भी है। सिंध और बलूचिस्तान लगातार पानी की कमी की शिकायत कर रहे हैं। दूसरी ओर पंजाब पर तय हिस्से से अधिक पानी लेने के आरोप लगते रहे हैं। कई नहरों में 60 से 80 प्रतिशत तक पानी की कमी दर्ज की गई है।

भारत पर आरोप लगाकर ध्यान भटकाने की कोशिश

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अपने आंतरिक जल संकट, खराब प्रशासन और आतंकवाद जैसे मुद्दों से अंतरराष्ट्रीय ध्यान हटाने के लिए भारत पर पानी रोकने का आरोप लगा रहा है। लेकिन उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान का जल संकट मुख्य रूप से उसकी अपनी नीतिगत विफलताओं और वर्षों की लापरवाही का परिणाम है। भारत लगातार यह स्पष्ट कर चुका है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि को लेकर पहले जैसी स्थिति बहाल होना संभव नहीं है। फिलहाल पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत नहीं, बल्कि अपनी जल नीति, जल संरक्षण और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की है।

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