दुनिया में सबसे ज्यादा रिसर्च पेपर वापस लेने वाले टॉप-10 इंस्टिट्यूशन में भारत के 6 युनिवर्सिटीज

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CENTRAL NEWS DESK: एक समय था जब भारत को विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उभरती हुई महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा था। हर साल लाखों रिसर्च पेपर प्रकाशित हो रहे हैं, भारतीय विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में जगह बना रहे हैं और सरकार भी देश को Research & Innovation Hub बनाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। लेकिन इसी बीच एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने पूरे शिक्षा जगत, वैज्ञानिक समुदाय और नीति-निर्माताओं को चिंता में डाल दिया है।

साल 2025 के आंकड़ों के अनुसार पहली बार दुनिया में सबसे अधिक Research Paper Retraction यानी प्रकाशित होने के बाद वापस लिए गए शोध पत्रों वाले शीर्ष 10 विश्वविद्यालयों में भारत के छह विश्वविद्यालय शामिल हो गए हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि भारत की वैज्ञानिक विश्वसनीयता, रिसर्च की गुणवत्ता और अकादमिक ईमानदारी पर बड़ा सवाल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो भारत की वैश्विक वैज्ञानिक पहचान को बड़ा नुकसान हो सकता है।

दुनिया में दूसरा सबसे ज्यादा रिट्रैक्शन वाला देश बना भारत

Retraction Watch Database के अनुसार वर्ष 2025 में भारत से कुल 887 रिसर्च पेपर वापस लिए गए, जो दुनिया में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। चीन में यह संख्या 1701 रही जबकि तीसरे स्थान पर मौजूद इराक में केवल 429 पेपर वापस लिए गए। इसके बाद रूस, सऊदी अरब और अमेरिका का स्थान आता है।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि भारत दुनिया के कुल रिसर्च प्रकाशनों में लगभग पांच प्रतिशत योगदान देता है, लेकिन वैश्विक रिट्रैक्शन में उसकी हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी जितनी तेजी से शोध प्रकाशित हो रहे हैं, उतनी ही तेजी से उनमें गंभीर खामियां भी सामने आ रही हैं। यह असंतुलन भारत की वैज्ञानिक प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

टॉप-10 विश्वविद्यालयों में भारत का दबदबा, लेकिन गलत वजह से

दुनिया में सबसे ज्यादा रिसर्च पेपर वापस लेने वाले विश्वविद्यालयों की सूची में पहला स्थान चेन्नई की Anna University का है, जहां 161 शोध पत्र वापस लिए गए। दूसरे स्थान पर Dr. APJ Abdul Kalam Technical University रही, जहां 160 रिट्रैक्शन दर्ज किए गए। तीसरे स्थान पर Saveetha Institute (SIMATS) का नाम है, जहां 159 शोध पत्र वापस लिए गए।

इसके अलावा JNTU Hyderabad, Lovely Professional University और Visvesvaraya Technological University भी दुनिया के टॉप-10 रिट्रैक्शन वाले विश्वविद्यालयों में शामिल हैं। टॉप-19 संस्थानों की सूची में भारत के कुल नौ विश्वविद्यालय मौजूद हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या कुछ चुनिंदा संस्थानों में अधिक गहरी है, हालांकि इसका असर पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र की छवि पर पड़ रहा है।

रिट्रैक्शन का मतलब क्या है और यह इतना गंभीर मामला क्यों है?

किसी भी शोध पत्र का रिट्रैक्ट होना यानी उसे प्रकाशित होने के बाद आधिकारिक रूप से वापस ले लेना। ऐसा तब किया जाता है जब जांच में यह सामने आता है कि शोध में गलत डेटा दिया गया, परिणाम भरोसेमंद नहीं हैं, साहित्यिक चोरी की गई है, नकली Peer Review कराया गया है या फिर रिसर्च एथिक्स का उल्लंघन हुआ है।

वैज्ञानिक दुनिया में कभी-कभी ईमानदारी से हुई गलती के कारण भी शोध वापस लिया जाता है और इसे वैज्ञानिक प्रणाली की आत्म-सुधार प्रक्रिया माना जाता है। लेकिन जब बड़ी संख्या में रिट्रैक्शन किसी एक देश या संस्थानों से आने लगें, तब यह संकेत होता है कि समस्या व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत और प्रणालीगत बन चुकी है।

जांच में सामने आए चौंकाने वाले कारण

वर्ष 2025 में वापस लिए गए भारतीय रिसर्च पेपरों की जांच में कई गंभीर कारण सामने आए। सबसे अधिक मामलों में प्रकाशकों या जर्नल द्वारा की गई जांच के बाद पेपर वापस लिए गए। बड़ी संख्या में शोध पत्रों में गलत निष्कर्ष, संदर्भ देने में गड़बड़ी, AI से तैयार सामग्री, नकली Peer Review, Paper Mills का इस्तेमाल, डेटा में हेराफेरी, लेखकों के नाम को लेकर विवाद और तस्वीरों या ग्राफ में छेड़छाड़ जैसी अनियमितताएं पाई गईं।

यह स्थिति केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि रिसर्च सिस्टम में बढ़ती अनियमितताओं की ओर इशारा करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में भारत की वैज्ञानिक विश्वसनीयता और कमजोर हो सकती है।

Publish or Perish की संस्कृति ने बढ़ाया दबाव

भारतीय विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ वर्षों से एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, जिसे Publish or Perish कहा जाता है। इसका अर्थ है कि यदि शिक्षक या शोधकर्ता लगातार रिसर्च प्रकाशित नहीं करेगा तो उसका प्रमोशन, वेतन वृद्धि, फंडिंग और संस्थान में मूल्यांकन प्रभावित हो सकता है।

यही दबाव कई बार शोधकर्ताओं को कम समय में अधिक से अधिक पेपर प्रकाशित करने की दौड़ में धकेल देता है। परिणामस्वरूप गुणवत्ता से ज्यादा संख्या पर ध्यान दिया जाने लगता है। कई मामलों में जल्दबाजी में अधूरी या कमजोर रिसर्च भी प्रकाशित हो जाती है, जो बाद में जांच में फंस जाती है।

NIRF रैंकिंग पर भी उठे सवाल

भारत की National Institutional Ranking Framework (NIRF) में रिसर्च पेपरों की संख्या और उनके Citation को महत्वपूर्ण मानदंड माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसी वजह से कई संस्थानों ने गुणवत्ता से अधिक प्रकाशनों की संख्या बढ़ाने पर जोर देना शुरू कर दिया।

हालांकि सरकार ने अब रिट्रैक्ट हुए शोध पत्रों के लिए नेगेटिव मार्किंग जैसी व्यवस्था भी लागू की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अभी पर्याप्त नहीं है और रिसर्च गुणवत्ता की निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है।

कम फंडिंग और बढ़ती अपेक्षाएं भी बनी चुनौती

भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.65 प्रतिशत हिस्सा ही रिसर्च एवं डेवलपमेंट पर खर्च करता है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 2.46 प्रतिशत है। सीमित बजट, आधुनिक प्रयोगशालाओं की कमी, प्रशिक्षित स्टाफ का अभाव और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच शोधकर्ताओं पर लगातार अधिक प्रकाशन का दबाव बना रहता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब संसाधन सीमित हों और परिणाम जल्दी देने का दबाव हो, तब रिसर्च की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। यही स्थिति कई भारतीय संस्थानों में देखने को मिल रही है।

किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां

रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक रिट्रैक्शन टेक्नोलॉजी, डेटा साइंस और कंप्यूटर साइंस जैसे क्षेत्रों में दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा मटेरियल साइंस, न्यूरोलॉजी, बायोकैमिस्ट्री, नैनो टेक्नोलॉजी, पर्यावरण विज्ञान और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में भी बड़ी संख्या में शोध पत्र वापस लिए गए।

इन क्षेत्रों में तेजी से रिसर्च प्रकाशित करने की वैश्विक प्रतिस्पर्धा रहती है। इसी कारण गुणवत्ता की अनदेखी होने की संभावना भी अधिक रहती है।

चीन ने कैसे सुधारी अपनी व्यवस्था

कुछ वर्ष पहले चीन भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहा था। वहां हजारों शोध पत्र वापस लिए गए थे। इसके बाद चीन ने कड़े नियम लागू किए। शोधकर्ताओं के लिए रिट्रैक्शन की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य बनाया गया, संस्थानों को जांच के निर्देश दिए गए और दोषी पाए जाने पर वेतन कटौती, पदावनति तथा फंडिंग रोकने जैसे कठोर कदम उठाए गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भी रिसर्च ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए इसी तरह पारदर्शी और सख्त व्यवस्था अपनानी होगी।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता बचाने की

वैज्ञानिक शोध केवल आंकड़ों का खेल नहीं होता, बल्कि विश्वास की नींव पर खड़ा होता है। यदि किसी देश के प्रमुख विश्वविद्यालय बार-बार रिट्रैक्शन सूची में दिखाई देने लगें तो उसका असर केवल रैंकिंग तक सीमित नहीं रहता। इससे अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग प्रभावित हो सकता है, विदेशी फंडिंग कम हो सकती है और वैश्विक स्तर पर भारतीय शोधकर्ताओं की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।

भारत आज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने का सपना देख रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह लक्ष्य केवल अधिक शोध पत्र प्रकाशित करने से नहीं बल्कि ईमानदार, प्रमाणिक और विश्वसनीय रिसर्च के जरिए ही हासिल किया जा सकता है। मौजूदा रिपोर्ट भारत के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। यदि अभी रिसर्च व्यवस्था में व्यापक सुधार किए गए तो भारत न केवल शोध की संख्या बल्कि उसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता में भी दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है।

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