Trump Iran War: ट्रम्प पर 1 मई की डेडलाइन का दबाव, जंग जारी रखने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
CENTRAL NEWS DESK: अमेरिका में मौजूदा समय में ईरान के साथ चल रहे सैन्य टकराव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती 1 मई की डेडलाइन है, जिसके पहले उन्हें अमेरिकी संसद यानी सीनेट से जंग जारी रखने की मंजूरी हासिल करनी होगी। अमेरिकी कानून के मुताबिक, कोई भी राष्ट्रपति बिना संसद की मंजूरी के केवल 60 दिन तक ही सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है। इस समयसीमा के करीब आते ही ट्रम्प के लिए हालात जटिल होते नजर आ रहे हैं।
60 दिन का नियम और ट्रम्प की स्ट्रेटजी
अमेरिका के ‘वार पावर्स एक्ट’ के तहत राष्ट्रपति को किसी भी सैन्य कार्रवाई के 48 घंटे के भीतर संसद को सूचना देनी होती है और 60 दिनों के अंदर मंजूरी लेना अनिवार्य होता है। ट्रम्प प्रशासन ने इस नियम के भीतर रहते हुए एक रणनीतिक कदम उठाया। जंग की शुरुआत 28 फरवरी को की गई, लेकिन संसद को इसकी आधिकारिक सूचना 2 मार्च को दी गई। इससे 60 दिन की गिनती आगे खिसक गई और अब अंतिम तारीख 1 मई तय हुई है। यह कदम ट्रम्प की रणनीतिक सोच को दिखाता है, लेकिन अब यही समयसीमा उनके लिए सियासी दबाव बन चुकी है।
सीनेट का गणित और बढ़ती मुश्किलें
अमेरिकी सीनेट में कुल 100 सदस्य हैं। इनमें ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 सीटें हैं, जबकि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 47 सीटें हैं। देखने में यह बहुमत ट्रम्प के पक्ष में लगता है, लेकिन असल स्थिति इतनी आसान नहीं है।
रिपब्लिकन पार्टी के ही करीब 10 सांसद इस जंग के खिलाफ खुलकर सामने आ चुके हैं। यदि ये सांसद विरोध में वोट करते हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी एकजुट रहती है, तो ट्रम्प के लिए बहुमत जुटाना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि ट्रम्प संसद में वोटिंग से बचना चाहते हैं।
जंग खत्म करने की जल्दी क्यों?
माना जा रहा है कि ट्रम्प 1 मई से पहले किसी भी तरह जंग को समाप्त करने की कोशिश कर सकते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण संसद में संभावित हार का खतरा है। अगर संसद मंजूरी नहीं देती, तो ट्रम्प को सैन्य कार्रवाई रोकनी पड़ेगी, जो उनकी राजनीतिक छवि पर असर डाल सकता है।
इसके अलावा, अमेरिका में राष्ट्रपति के फैसलों पर कानूनी और राजनीतिक दोनों तरह की जांच होती है। ऐसे में संसद से टकराव ट्रम्प के लिए और बड़ी मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
क्या ट्रम्प डेडलाइन को नजरअंदाज कर सकते हैं?
यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि क्या ट्रम्प इस 60 दिन की सीमा को अनदेखा कर सकते हैं। अमेरिकी इतिहास में कई राष्ट्रपति इस तरह की सीमाओं को चुनौती देते रहे हैं। 2011 में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लीबिया में 60 दिन से ज्यादा सैन्य कार्रवाई जारी रखी थी। उनका तर्क था कि वहां “कॉन्टिन्यूस कॉम्बैट” जैसी स्थिति नहीं थी, इसलिए यह कानून पूरी तरह लागू नहीं होता। इसी तरह, ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में 2019 में एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया था, जिसमें यमन जंग में अमेरिका की भूमिका खत्म करने की बात कही गई थी। ट्रम्प ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप बताया था। हालांकि, इस बार स्थिति अलग है। यदि ट्रम्प समयसीमा को नजरअंदाज करते हैं, तो उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
30 दिन का अतिरिक्त विकल्प
कानून में एक और प्रावधान है, जिसके तहत राष्ट्रपति 30 दिन का अतिरिक्त समय ले सकते हैं। लेकिन यह केवल सैनिकों की सुरक्षित वापसी के लिए होता है, न कि जंग जारी रखने के लिए। इसका मतलब यह है कि ट्रम्प इस विकल्प का उपयोग करके जंग को आगे नहीं बढ़ा सकते। पर बढ़ता तनाव
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मध्य पूर्व में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच टकराव का असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है।
हाल ही में इजराइल और लेबनान के बीच सीजफायर को तीन हफ्तों के लिए बढ़ाया गया है, लेकिन क्षेत्र में अस्थिरता अभी भी बनी हुई है। यूरोपियन यूनियन की बैठक में भी इस मुद्दे पर गहन चर्चा हुई और नेताओं ने ऊर्जा संकट और सुरक्षा चिंताओं पर फोकस किया।
तेल की कीमतों में उछाल
जंग का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें लगातार तीन दिनों से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई दोनों में तेजी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत जैसे आयातक देशों पर महंगाई और व्यापार घाटे का दबाव बढ़ सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट बना तनाव का केंद्र
होर्मुज स्ट्रेट इस संघर्ष का सबसे संवेदनशील बिंदु बन चुका है। ईरान ने यहां जहाजों से टोल वसूलना शुरू कर दिया है और कुछ जहाजों को जब्त भी किया गया है। इससे वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा बढ़ गया है। ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि जब तक उसकी फ्रीज की गई संपत्तियां रिलीज नहीं होतीं, तब तक वह इस क्षेत्र में दबाव बनाए रखेगा।
कूटनीतिक प्रयास और पाकिस्तान की भूमिका
तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का पाकिस्तान दौरा संभावित बातचीत की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। पाकिस्तान इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और दोनों पक्षों के बीच संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
NATO देशों पर ट्रम्प का रुख
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन उन नाटो सहयोगी देशों से नाराज है, जिन्होंने इस जंग में पूरा समर्थन नहीं दिया। पेंटागन के अंदर ऐसे विकल्पों पर विचार किया जा रहा है, जिनके जरिए इन देशों पर दबाव बनाया जा सके।
हालांकि, अमेरिका के NATO से बाहर निकलने जैसी कोई योजना सामने नहीं आई है, लेकिन यह मुद्दा ट्रम्प की विदेश नीति को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।
news Journalist
