सहमति की उम्र घटाने का विवाद: NCPCR ने बताया ‘टाइम बम’, विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता
Central News Desk: संबंध बनाने के लिए सहमति की उम्र 18 से घटाकर 16 करने की मांग को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने इस कदम को समाज और परिवारों के लिए “टाइम बम” करार देते हुए कहा कि इसे तुरंत निष्क्रिय करना जरूरी है। उनका कहना है कि बच्चों की मानसिक, सामाजिक और शैक्षिक परिपक्वता को देखते हुए यह निर्णय भविष्य में गहरे संकट पैदा कर सकता है।
दिल्ली में आयोजित गोलमेज सम्मेलन “सभ्यता पर अतिक्रमण: सहमति की उम्र कम करना – इसके प्रभाव का विश्लेषण” में कानूनगो ने कहा, “मैं पिछले एक दशक से बच्चों के साथ काम कर रहा हूं। यदि यह टाइम बम फटा, तो यह परिवार और समाज दोनों को तोड़ देगा।”

डॉक्टर और मनोवैज्ञानिकों का विरोध
कई डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी सहमति की उम्र घटाने का विरोध किया। उनका कहना है कि 16 वर्ष की उम्र में किशोर मानसिक और भावनात्मक रूप से परिपक्व नहीं होते। इस उम्र में लिए गए निर्णय उनके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों ने चेताया कि किशोरावस्था में गर्भधारण से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरे भी बढ़ सकते हैं।
छात्रों की आत्महत्या से जोड़ा मुद्दा
कानूनगो ने छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं को भी इससे जोड़ा। उन्होंने कहा कि 10वीं और 12वीं के नतीजों के दिन बड़ी संख्या में छात्र अवसाद और दबाव में आत्महत्या कर रहे हैं। “हम पहले ही हजारों बच्चों को खो चुके हैं। ऐसे में 16 साल की उम्र में संबंध बनाने की अनुमति देना समाज के लिए और बड़ी चुनौती साबित होगी।”
इंदिरा जयसिंह की सुप्रीम कोर्ट में दलील
इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सहमति की वैधानिक उम्र 18 से घटाकर 16 करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि मौजूदा कानून किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक संबंधों को भी अपराध मानता है, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने निपुण सक्सेना बनाम भारत सरकार मामले में यह दलील दी कि 16 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के रिश्तों को अपराध मानना व्यवहारिक और संवैधानिक रूप से गलत है।
समाज में गहरी बहस जारी
यह मुद्दा अब कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर गहरी बहस का कारण बन गया है। एक ओर जहां विशेषज्ञ मानसिक और शारीरिक परिपक्वता का हवाला देकर उम्र घटाने का विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अधिकार कार्यकर्ता किशोरों की स्वतंत्रता और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की बात कर रहे हैं। आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस बहस का भविष्य तय करेगा।
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