अमेरिकी अधिकारियों ने ट्रंप को दी सलाह – “भारत क्यों है अहम साझेदार, इसे याद रखें”
Delhi News Desk: भारत-अमेरिका रिश्तों में बढ़ते तनाव और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारतीय आयात पर 50% तक टैरिफ लगाने के फैसले के बीच पूर्व शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों ने ट्रंप प्रशासन को चेताया है। उनका कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो अमेरिका एक अहम रणनीतिक साझेदार खो सकता है और भारत सीधे चीन-रूस के पाले में जा सकता है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन और डिप्टी सेक्रेटरी कर्ट एम. कैंपबेल ने Foreign Affairs पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में लिखा कि भारत-अमेरिका संबंध केवल “व्यापार तक सीमित नहीं हैं”, बल्कि यह साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दबंगई को रोकने में निर्णायक रही है।
“ट्रंप की बयानबाज़ी समझें डीलमेकिंग का हिस्सा”
लेख में कहा गया कि अमेरिका के साझेदारों को भारत को यह समझाना चाहिए कि राष्ट्रपति ट्रंप का नाटकीय अंदाज़ अक्सर समझौते की प्रस्तावना होता है। हालांकि, मौजूदा हालात – टैरिफ विवाद, रूस से तेल खरीद और पाकिस्तान को लेकर नए तनाव – ने रिश्तों को तेज़ी से कमजोर किया है।
भारत का झुकाव चीन-रूस की ओर?
पूर्व अधिकारियों ने चेतावनी दी कि अगर यह तनाव यूं ही बढ़ता रहा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन के साथ और नज़दीकी बढ़ा सकते हैं। हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन में तीनों नेताओं की मुलाकात को इसी दिशा का संकेत बताया गया।
पाकिस्तान को लेकर साफ संदेश
सुलिवन और कैंपबेल ने यह भी कहा कि अमेरिका को “भारत-पाकिस्तान नीति” जैसी पुरानी सोच छोड़नी होगी। अमेरिका के लिए पाकिस्तान के साथ आतंकवाद-निरोध और परमाणु हथियार नियंत्रण अहम हैं, लेकिन भारत के साथ उसके बहुआयामी संबंध कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
हाल ही में ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर का वॉशिंगटन में स्वागत किया और तेल व व्यापार पर सहयोग का ऐलान किया। इसके कुछ ही दिन बाद भारत पर भारी टैरिफ लगा दिया गया, जिससे भारत-अमेरिका रिश्तों में कड़वाहट और गहरी हो गई।
5 स्तंभों पर नए गठबंधन का सुझाव
दोनों पूर्व अधिकारियों ने सुझाव दिया कि भारत-अमेरिका को एक नए सामरिक गठबंधन पर विचार करना चाहिए। यह पांच स्तंभों पर आधारित होगा –
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- सेमीकंडक्टर्स
- बायोटेक
- क्वांटम व क्लीन एनर्जी
- एयरोस्पेस व टेलीकम्युनिकेशन
उनका मानना है कि अगले 10 वर्षों के लिए एक साझा तकनीकी रोडमैप तैयार करना होगा, जिससे दोनों देशों की सुरक्षा, समृद्धि और लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूती मिलेगी।
पिछले दौर की सफल साझेदारियां
लेख में याद दिलाया गया कि इससे पहले कई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने के लिए ऐतिहासिक कदम उठा चुके हैं।
- जॉर्ज बुश और मनमोहन सिंह के बीच हुआ सिविल न्यूक्लियर डील
- जो बाइडेन और नरेंद्र मोदी के दौर में AI, बायोटेक और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में गहराता सहयोग
ये उदाहरण बताते हैं कि भारत को केवल एक बाजार या सुरक्षा साझेदार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखा जाना चाहिए।
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