MP का ‘ड्रग सिस्टम’ बीमार: कैसे सरकारी सुस्ती ने 20 मासूम ज़िंदगियाँ निगल लीं
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जब तमिलनाडु ने 48 घंटे में सिरप रोक दिया, मध्य प्रदेश में फाइलें चलती रहीं
Central News Desk: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में 20 मासूम बच्चों की मौत ने पूरे देश को हिला दिया है। कारण — एक जहरीला कफ सिरप Coldrif, जिसे राज्य के सिस्टम ने “सुरक्षित” बता दिया था, जबकि तमिलनाडु ने 48 घंटे में उसे प्रतिबंधित कर दिया।
यह कहानी सिर्फ एक दूषित सिरप की नहीं, बल्कि उस बीमार दवा नियंत्रण व्यवस्था की है, जो लोगों की जान बचाने के बजाय खुद सुस्ती में मर रही है।
पहली चेतावनी 19 सितंबर को, कार्रवाई 4 अक्टूबर को — 15 दिन की मौतभरी देरी
19 सितंबर को नागपुर से रिपोर्ट आई कि बच्चों की मौतें किसी दूषित खांसी की दवा से जुड़ी हैं।
22 सितंबर को स्वास्थ्य विभाग की टीम छिंदवाड़ा पहुँची, 26 से 28 सितंबर के बीच NCDC और NHM ने सैंपल लिए।
लेकिन 29 सितंबर तक 10 बच्चों की मौत हो चुकी थी।
वही सिरप — Coldrif, जिसे तमिलनाडु ने 3 अक्टूबर तक “जहरीला” साबित कर दिया था,
मध्य प्रदेश में तब भी “सुरक्षित” बताया जा रहा था।
बिना रिपोर्ट के ‘क्लीन चिट’
मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने 1 और 3 अक्टूबर को दो बार बयान दिया —
“सिरप सुरक्षित है, घबराने की बात नहीं।”
लेकिन तब तक किसी भी लैब रिपोर्ट का आना बाकी था। यानी बिना जांच, बिना सबूत, सरकार ने कंपनी को क्लीन चिट दे दी। अब वही बयान, 20 बच्चों की मौत के बाद, एक कड़वा सच बन गया है।
ड्रग कंट्रोलर बोले — “हम जांच कर रहे हैं”
NDTV ने जब मध्य प्रदेश ड्रग कंट्रोलर दिनेश श्रीवास्तव से पूछा कि इतनी गंभीर स्थिति में सैंपल डाक से क्यों भेजे गए,
तो उन्होंने कहा — “परंपरागत रूप से सैंपल ऐसे ही भेजे जाते हैं, लेकिन अब जांच चल रही है, जिनसे देरी हुई है उन्हें निलंबित किया गया है।”
यह बयान उस सिस्टम का परिचय है, जो इंसानी ज़िंदगियों को “परंपरा” के नाम पर खोता जा रहा है।
कमज़ोर जांच व्यवस्था — तीन लैब, 5500 लंबित सैंपल
मध्य प्रदेश में दवा जांच की क्षमता बेहद सीमित है — राज्य में सिर्फ तीन लैब (भोपाल, इंदौर, जबलपुर)। कुल क्षमता — सालाना 6000 सैंपल। फिलहाल 5500 सैंपल लंबित, हर जांच में 2–3 दिन लगते हैं। पूरे प्रदेश में मात्र 80 ड्रग इंस्पेक्टर हैं। यानी अगर यही रफ्तार रही, तो सभी सैंपलों को जांचने में एक साल से ज़्यादा लगेगा।
जांच वैन धूल खा रहीं, जब जहर फैल रहा था
राज्य सरकार के पास दो मोबाइल ड्रग टेस्टिंग वैन हैं —
जो मौके पर जाकर तुरंत जांच कर सकती थीं लेकिन दोनों भोपाल की इदगाह हिल्स लैब में धूल खा रही हैं एक 2022 से बंद है, दूसरी कभी चली ही नहीं।
संयुक्त नियंत्रक टीना यादव ने कहा — “कुछ टेस्ट वैन में हो सकते हैं, लेकिन बाकी के लिए बड़े उपकरण चाहिए।” यह बयान अब एक प्रतीक बन चुका है —
उस सरकारी सुस्ती का, जिसने चेतावनी को भी कागज़ में बदल दिया।
सिरप की 660 बोतलें — 19 अब भी लापता
Coldrif सिरप की 660 बोतलें छिंदवाड़ा और आसपास के जिलों में वितरित की गईं।
इनमें से
- 457 जब्त,
- 28 जांच के लिए भेजी गईं,
- 156 बच्चों को दी जा चुकी हैं,
- और 19 बोतलें अब भी गायब हैं।
किसी को नहीं पता कि ये जहरीली बोतलें कहाँ हैं —
किसी घर में? किसी अस्पताल में? या किसी बच्चे के हाथ में?
जब जहर फैल रहा था, तब फाइलें चल रही थीं
यह कहानी किसी एक कंपनी की नहीं, बल्कि उस बीमार सिस्टम की है जो चेतावनी मिलने के बाद भी जागा नहीं। जहाँ मौतें हो रही थीं, वहाँ बैठकें चल रही थीं। जहाँ कार्रवाई करनी थी, वहाँ बयान दिए जा रहे थे। जहाँ जांच होनी थी, वहाँ “डाक” भेजी जा रही थी।
सवाल अब यह नहीं कि जिम्मेदार कौन है… सवाल यह है कि इलाज कौन करेगा?
मध्य प्रदेश का ड्रग सिस्टम अब एक चेतावनी है — अगर एक जहरीली दवा इतनी आसानी से बच्चों तक पहुँच सकती है, तो कौन सी दवा वाकई सुरक्षित है? राज्य की दवा जांच व्यवस्था, लैब क्षमता और प्रशासनिक लापरवाही ने मिलकर एक ऐसा सिस्टम बना दिया है जो खुद ही बीमार है।
यह त्रासदी सिर्फ उन 20 बच्चों की नहीं,
बल्कि उस सरकार की है जिसने अपनी संवेदनशीलता खो दी है।
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