Supreme Court of India का बड़ा फैसला: सेना में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन का अधिकार, पेंशन भी मिलेगी
CENTRAL NEWS DESK: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अफसरों को स्थायी कमीशन से वंचित रखना भेदभावपूर्ण था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन महिला अधिकारियों को पहले स्थायी कमीशन नहीं मिला और वे सेवा से बाहर हो चुकी हैं, उन्हें भी पेंशन का लाभ दिया जाएगा।
यह फैसला जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जवल भुईयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया। यह मामला सुचेता एडन समेत कई महिला अधिकारियों की याचिकाओं पर आधारित था, जिन्होंने केंद्र सरकार की 2019 की नीति और आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के फैसलों को चुनौती दी थी।
2019 के बाद सेवा देने वाली महिलेओं को मिलेगा लाभ
भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को लंबे समय तक केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत ही नियुक्त किया जाता था। इसका मतलब यह था कि वे सीमित समय तक सेवा दे सकती थीं और उन्हें पुरुष अधिकारियों की तरह स्थायी कमीशन नहीं मिलता था। हालांकि 2019 में केंद्र सरकार ने कुछ शाखाओं में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की नीति बनाई, लेकिन इसमें एक शर्त जोड़ दी गई कि केवल मार्च 2019 के बाद सेवा में आने वाली महिला अधिकारियों को ही इसका लाभ मिलेगा। इससे पहले से सेवा कर रहीं कई महिला अधिकारी इस अधिकार से वंचित रह गईं।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन न देना उनकी योग्यता या क्षमता की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद लैंगिक भेदभाव का परिणाम था। अदालत ने यह भी कहा कि अब यह माना जाएगा कि प्रभावित महिला अधिकारियों ने पेंशन के लिए जरूरी 20 साल की सेवा पूरी कर ली है, भले ही उन्हें पहले ही सेवा से हटा दिया गया हो। कोर्ट ने यह फैसला “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए अपने विशेष अधिकार (आर्टिकल 142) के तहत दिया।
कोर्ट की तीन बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिला अधिकारियों को तीन प्रमुख राहतें दीं:
- जिन महिला अधिकारियों को पहले ही स्थायी कमीशन मिल चुका है, उनके स्टेटस में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
- जो महिला अधिकारी इस केस के दौरान सेवा से बाहर हो गईं, उन्हें 20 साल की सेवा पूरी मानकर पेंशन और अन्य लाभ दिए जाएंगे, हालांकि उन्हें पिछला वेतन (एरियर) नहीं मिलेगा।
- जो महिला अधिकारी वर्तमान में सेवा में हैं, उन्हें निर्धारित 60% कटऑफ पूरा करने पर स्थायी कमीशन दिया जाएगा, बशर्ते वे अन्य आवश्यक मानदंडों को पूरा करें।
यह आदेश JAG (जज एडवोकेट जनरल) और AEC (एजुकेशन कॉर्प्स) शाखाओं पर लागू नहीं होगा, क्योंकि इन क्षेत्रों में पहले से ही महिलाओं को स्थायी कमीशन के लिए अवसर दिया जाता रहा है।
तीनों सेनाओं पर कोर्ट की टिप्पणी
आर्मी
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों की ACR (परफॉर्मेंस रिपोर्ट) में पूर्वाग्रह था। कई मामलों में रिपोर्ट इस धारणा के साथ लिखी गई कि महिलाओं को आगे अवसर नहीं मिलेगा। इसके कारण उनकी मेरिट प्रभावित हुई और वे पुरुष अधिकारियों से पीछे रह गईं। साथ ही, उन्हें पर्याप्त ट्रेनिंग और मौके भी नहीं दिए गए।
नेवी
नेवी के मामले में भी कोर्ट ने मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और पूर्वाग्रह की बात कही। हालांकि, ‘डायनेमिक वैकेंसी मॉडल’ को कोर्ट ने उचित और गैर-भेदभावपूर्ण माना।
एयर फोर्स
एयर फोर्स में कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के न्यूनतम मानदंड जल्दबाजी में लागू किए गए। कुछ बैचों का मूल्यांकन सही समय और तरीके से नहीं हुआ, जिससे प्रक्रिया में खामियां रहीं।
मामला कैसे शुरू हुआ?
यह मामला लगभग दो दशक पुराना है।
- 2003 में बबीता पुनिया ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
- इसके बाद 2009 तक कई महिला अधिकारियों ने इसी मुद्दे पर अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कीं।
- 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया।
- इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां इस पर अंतिम निर्णय दिया गया।
वर्तमान स्थिति: महिलाओं की भूमिका
थलसेना
महिलाओं को अभी भी कॉम्बैट रोल जैसे इन्फैंट्री, टैंक और आर्टिलरी में शामिल नहीं किया जाता, लेकिन वे इंजीनियरिंग, सिग्नल, लॉजिस्टिक्स और इंटेलिजेंस जैसी शाखाओं में सेवा देती हैं।
वायुसेना
वायुसेना में महिलाएं फाइटर पायलट से लेकर ग्राउंड ड्यूटी तक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वे हेलिकॉप्टर और फाइटर जेट भी उड़ा रही हैं।
नौसेना
नौसेना में महिलाएं लॉजिस्टिक्स, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, पायलट और तकनीकी शाखाओं में कार्यरत हैं।
फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि महिलाओं को उनकी क्षमता के आधार पर समान अवसर मिलना चाहिए, न कि किसी पूर्वाग्रह के आधार पर उन्हें पीछे रखा जाए। यह फैसला न केवल हजारों महिला अधिकारियों को न्याय और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि भविष्य में सशस्त्र बलों में महिलाओं की भूमिका को और मजबूत करेगा।
कुल मिलाकर, यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका द्वारा समानता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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