सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: स्कूलों में लड़कियों को फ्री सैनिटरी पैड अनिवार्य, अलग टॉयलेट न होने पर रद्द होगी मान्यता
CENTRAL NEWS DESK: देशभर के गवर्नमेंट और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाली करोड़ों छात्राओं के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि हर स्कूल में लड़कियों को फ्री सैनेटरी पैड उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट बनाए जाने जरूरी होंगे। आदेश का पालन न करने वाले स्कूलों की मान्यता रद की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर स्कूल में दिव्यांगों के डिसेबल फ्रेंडली टॉयलेट मौजूद हों।
जनहित याचिका पर हुई सुनवाई
केंद्र सरकार की मेन्स्ट्रुअल हाइजीन पॉलिसी को पूरे देश में लागू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पिछले चार साल से सुनवाई चल रही थी। शुक्रवार को कोर्ट ने इस मामले में अंतिम फैसला सुनाया। यह जनहित याचिका सोशल वर्कर जया ठाकुर ने साल 2022 में दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि स्कूलों में मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं की कमी के कारण लड़कियों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और सम्मान तीनों प्रभावित हो रहे हैं।
संविधान के अधिकारों का उल्लंघन बताया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। अगर लड़कियों को सैनेटरी पैड जैसी सुविधा नहीं मिलती, तो वे लड़कों की तरह पढ़ाई और गतिविधियों में बराबरी से हिस्सा नहीं ले पातीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधा मिलना अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के अंतर्गत आता है। सुविधा न मिलने से लड़कियों की निजता और आत्मसम्मान दोनों प्रभावित होते हैं।
‘लड़कियों के शरीर को बोझ समझा जाता है’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त और भावनात्मक टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा
“यह आदेश सिर्फ कानून से जुड़े लोगों के लिए नहीं है। यह उन क्लासरूम के लिए है, जहां लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं। यह उन टीचर्स के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी से बंधे हुए हैं।”
कोर्ट ने कहा कि समाज में लड़कियों के शरीर को बोझ के रूप में देखा जाता है, जबकि इसमें बच्चियों की कोई गलती नहीं है। यह सोच बदलना जरूरी है।
‘पीरियड्स में स्कूल छोड़ने को मजबूर होती हैं लड़कियां’
याचिकाकर्ता जया ठाकुर ने कोर्ट को बताया कि पीरियड्स के दौरान होने वाली समस्याओं के कारण कई लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं। कई गरीब परिवारों के पास सैनेटरी पैड खरीदने के लिए पैसे नहीं होते। ऐसे में लड़कियां कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, जिससे संक्रमण और असहजता का खतरा रहता है।
स्कूलों में न तो फ्री सैनेटरी पैड मिलते हैं और न ही इस्तेमाल किए गए पैड के डिस्पोजल की व्यवस्था होती है। इसी वजह से मासिक धर्म के दिनों में लड़कियों की उपस्थिति घट जाती है और कई बार वे पढ़ाई ही छोड़ देती हैं।
स्कूलों को क्या-क्या करना होगा
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब देश के हर स्कूल को
- लड़कियों को फ्री सैनेटरी पैड उपलब्ध कराने होंगे
- लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग और साफ टॉयलेट बनाने होंगे
- दिव्यांग छात्रों के लिए डिसेबल फ्रेंडली टॉयलेट सुनिश्चित करने होंगे
- सैनेटरी कचरे के सुरक्षित निपटान की व्यवस्था करनी होगी
इन निर्देशों का पालन न करने वाले स्कूलों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें मान्यता रद करना भी शामिल है।
दुनिया और स्कूलों की स्थिति
- दुनिया के 10 में से सिर्फ 4 स्कूल ही मासिक धर्म की जानकारी देते हैं
- 39% स्कूल मासिक धर्म से जुड़ी जानकारी देते हैं
- इनमें 34% प्राइमरी स्कूल
- और 84% सेकेंडरी स्कूल शामिल हैं
- 10 में से सिर्फ 3 स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट में सैनेटरी कचरे के लिए अलग डस्टबिन हैं
- अफ्रीका में 8 में से सिर्फ 1 स्कूल में फ्री सैनेटरी पैड मिलते हैं
- दुनिया के केवल 30 देशों के पास ही पिरिएड्स से जुड़े जरूरी आंकड़े मौजूद हैं
{सोर्स: डब्ल्यूएचओ-2024 रिपोर्ट}
मेन्स्ट्रुअल हाइजीन पॉलिसी
- लड़कियों को सस्ते और सुरक्षित सैनेटरी पैड मिलें
- स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और साफ टॉयलेट हों
- जरूरत पड़ने पर स्कूलों में फ्री सैनेटरी पैड उपलब्ध हों
- मासिक धर्म पर खुलकर बात करने और जागरूकता बढ़ाने का अभियान
- गांवों और गरीब इलाकों में खास सुविधाओं पर जोर
- इस्तेमाल किए गए पैड के डिस्पोजल की व्यवस्था
- लड़कियों को मासिक धर्म से जुड़ी सही जानकारी दी जाए
- समाज में फैली गलत धारणाओं और शर्म को खत्म करना
- सरकारी योजनाओं में सैनेटरी प्रोडक्ट को शामिल करना
- महिलाओं के स्वास्थ्य और समानता को प्राथमिकता देना
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