पटना में कांग्रेस की महाबैठक: बिहार चुनाव से पहले नई सियासी चाल या तेजस्वी के लिए इशारा?
Central News Desk: पटना का सदाकत आश्रम, जिसने आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी, पंडित नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की रणनीतियों का साक्षी रहा है, एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। बुधवार को यहीं कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक होने जा रही है। कांग्रेस इस बैठक को “नई लड़ाई का संकल्प” बता रही है, और इसे बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सियासी महत्व
सदाकत आश्रम में आखिरी बार 1940 में कांग्रेस की बड़ी बैठक हुई थी। उस समय यह जगह स्वतंत्रता संग्राम के लिए नीति निर्धारण का मुख्य केंद्र थी। अब 84 साल बाद, कांग्रेस यहां जुटकर अपने संगठन और सहयोगियों को स्पष्ट संदेश देना चाहती है। पार्टी का नारा भी इसी संकेत से जुड़ा है – “वोट चोरी रोकना है, संविधान बचाना है”।
कांग्रेस की रणनीति और सहयोगियों पर दबाव
कांग्रेस को भरोसा है कि ऐसी बैठकों से संगठन में ऊर्जा आती है। 2023 में तेलंगाना में हुई CWC बैठक के बाद पार्टी ने वहां जीत हासिल की थी। हालांकि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हार भी मिली, लेकिन कांग्रेस मानती है कि तेलंगाना का अनुभव सकारात्मक रहा। अब बिहार में बैठक कर पार्टी महागठबंधन में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। खासकर सीट बंटवारे को लेकर अभी कोई फार्मूला तय नहीं हुआ है। पिछली बार कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी थी, इस बार वह 60–66 सीटों पर दावा कर सकती है। यह बैठक सहयोगी दलों, खासकर तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) पर दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है।
राहुल गांधी की सक्रियता और कांग्रेस की नई जमीनी कोशिश
राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ ने बिहार कांग्रेस में नई ऊर्जा भरी है। पार्टी को लगता है कि इस माहौल को अब बड़े स्तर पर चुनावी जमीन में बदलना होगा। यही कारण है कि कांग्रेस अब गठबंधन के बावजूद अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही है। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी समेत 100 से ज्यादा नेता इस बैठक में शामिल होंगे।
क्या तेजस्वी के लिए संदेश है?
कांग्रेस की यह रणनीति कहीं न कहीं महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी RJD को भी संकेत देती है कि कांग्रेस इस बार “सिर्फ सहयोगी” की भूमिका में नहीं रहना चाहती। पार्टी बिहार चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल मान रही है और ज्यादा सीटें पाने के लिए दबाव बनाएगी। यह तेजस्वी यादव के लिए भी साफ संकेत है कि उन्हें कांग्रेस को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
पटना की यह महाबैठक कांग्रेस के लिए संगठन को मजबूत करने, सहयोगियों पर दबाव बनाने और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का मंच है। इसका कितना फायदा होगा, यह चुनावी नतीजे तय करेंगे। लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस ने बिहार चुनाव को गंभीरता से लिया है और इस बार हर हाल में बड़ी वापसी का सपना देख रही है।
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