आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का संदेश : व्यापार दबाव में नहीं, सहमति से हो – स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर

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Img.Credit: Amarujala

Delhi News Desk: दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दुनिया और भारत के सामने खड़ी चुनौतियों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि उपभोक्तावाद और ‘वोक कल्चर’ के कारण आज पूरी दुनिया में पाप, दुःख और संघर्ष बढ़ रहे हैं। ऐसे हालात में केवल धर्म और स्वदेशी का मार्ग ही मानवता को शांति और समरसता दे सकता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार सहमति से, दबाव में नहीं

अमेरिकी टैरिफ विवाद के बीच भागवत ने साफ कहा कि भारत को आत्मनिर्भर बनकर ही दुनिया में योगदान देना है। उन्होंने चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार कभी भी दबाव या मजबूरी में नहीं, बल्कि पारस्परिक सहमति से होना चाहिए। यही नीति भारत को वैश्विक स्तर पर मजबूती देगी।

‘हिंदुत्व’ का अर्थ : सत्य और प्रेम

मोहन भागवत ने ‘हिंदुत्व’ की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा – हिंदुत्व किसी धर्म या संप्रदाय की विचारधारा नहीं है, बल्कि यह सत्य और प्रेम पर आधारित जीवन शैली है, जो सबको साथ लेकर चलती है। उन्होंने कहा कि दुनिया का संचालन सौदेबाजी से नहीं, बल्कि एकता और सहयोग से होता है। अगर यह मार्ग अपनाया जाए तो दुनिया के संघर्ष समाप्त हो जाएंगे।

धर्म शाश्वत और सार्वकालिक

भागवत ने उपभोक्तावाद और वोक कल्चर को संकट बताते हुए कहा कि धर्म शाश्वत और सार्वकालिक सुखदायी तत्व है। धर्म वह है जो दुखदायी न हो। उन्होंने विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के पास धर्म का खजाना है, जिसे समय-समय पर पूरी दुनिया को देना चाहिए।

जातिगत भेदभाव समाप्त करने का आह्वान

संघ प्रमुख ने कहा कि समाज को संगठित करने के लिए जातिगत भेदभाव और आपसी अविश्वास को तुरंत खत्म करना होगा। स्वयंसेवकों को अपने आसपास की बस्तियों तक जाकर समरसता का कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में विविधता स्वाभाविक है, लेकिन सबको साथ लेकर चलना और सामंजस्य स्थापित करना ही सच्चा धर्म है।

इतिहास और संस्कृति की एकता

भागवत ने जोर देकर कहा कि केवल नक्शों पर रेखाएं खिंचने से देश अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी संस्कृति और इतिहास एक ही है। पड़ोसी देशों के साथ आत्मीय संबंध बनाकर उनके विकास की चिंता करना भारत का दायित्व है।

परिवार और समाज को जोड़ने की ज़रूरत

युवाओं की सोच निजी दायरे तक सीमित होती जा रही है, जिसे सुधारने के लिए ‘कुटुंब प्रबोधन’ की पहल करनी होगी। परिवार में सप्ताह में एक बार साथ बैठकर भोजन करना, धर्म-संस्कृति पर चर्चा करना और समाज के लिए जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हिंसा से किसी की बात मनवाना समाधान नहीं है, यह केवल समाज को तोड़ता है।

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