बिहार में पवन सिंह का पावर गेम: बीजेपी की नई रणनीति या चुनौती

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Bihar News Desk: बिहार की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दों और व्यक्तित्व आधारित प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट से उनके उतरने और बीजेपी को हुए नुकसान ने यह साफ कर दिया था कि उनकी लोकप्रियता सिर्फ सिनेमाई पर्दे तक सीमित नहीं है। अब जब वह दिल्ली में बीजेपी नेताओं से मिल रहे हैं और उपेंद्र कुशवाहा से माफी मांग रहे हैं, सवाल यह उठता है कि इस बार उनकी मौजूदगी पार्टी को कितना लाभ पहुंचा सकती है।

2024 में पवन सिंह ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया था। काराकाट सीट पर पहले से ही राजपूत बनाम यादव के वोटों का समीकरण था और पवन सिंह ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए राजपूत और भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में वोटों का बंटवारा कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि महागठबंधन ने यहां बाज़ी मार ली और बीजेपी भारी नुकसान झेलने को मजबूर हो गई। पवन सिंह की वजह से उपेंद्र कुशवाहा न केवल हारे बल्कि तीसरे स्थान पर चले गए। उनकी लोकप्रियता भोजपुर, बक्सर, आरा, सासाराम, कैमूर, रोहतास, सीवान और गाजीपुर तक फैले क्षेत्रों में भी गहरी छाप छोड़ती है। उनकी फ़िल्में और गाने गांव-गांव तक लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।

पवन सिंह का सबसे बड़ा प्रशंसक वर्ग युवा है, खासकर 18 से 35 साल के बीच के मतदाता उनके दीवाने हैं। यह वर्ग सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय है और मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में रहने वाले बिहारी प्रवासी भी उन्हें ‘अपनेपन’ का प्रतीक मानते हैं। बीजेपी इस भावनात्मक जुड़ाव को चुनावी रणनीति में इस्तेमाल कर सकती है और इसे अपनी राजनीतिक ताकत में बदल सकती है।

अगर पवन सिंह बीजेपी के प्रचार में सक्रिय होते हैं तो इसका असर काराकाट, रोहतास, कैमूर और भोजपुर जिलों की सीटों पर साफ दिखाई देगा। यादव, राजपूत और ब्राह्मण वोटों का संतुलन यहां बड़ा फैक्टर है और पवन सिंह स्थानीय स्टार के तौर पर इन वोटों को जोड़ने का काम कर सकते हैं। बीजेपी पहले से ही नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि पर चुनाव लड़ती आई है, लेकिन पवन सिंह जैसे स्थानीय सेलिब्रिटी स्टार के जुड़ने से प्रचार में एक नया रंग आएगा। रैलियों और रोड शो में उनकी मौजूदगी भीड़ खींचेगी और पार्टी की पहुँच जनसंस्कृति तक बढ़ेगी।

पवन सिंह का बीजेपी में शामिल होना सिर्फ एक सीट या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे बिहार में मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाएगा। उनकी लोकप्रियता पार्टी को यह दिखाने में मदद करेगी कि उसके पास सिर्फ राजनीतिक चेहरे ही नहीं हैं, बल्कि जनसांस्कृतिक प्रतिनिधि भी हैं। उपेंद्र कुशवाहा से माफी मांगना महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह संदेश देता है कि पवन सिंह अब पार्टी लाइन में चलना चाहते हैं। यह माफी भविष्य में किसी बगावती तेवर को कम करने और पार्टी के भीतर स्वीकार्यता बढ़ाने में भी सहायक होगी।

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