भारत की नई खोज: सांप के काटने से मौत रोकने के साथ अब जानवरों की जान भी बचेगी

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Central News Desk: भारत में हर साल सांप के काटने से लगभग 58 हजार लोगों की मौत हो जाती है, जबकि करीब दो लाख लोग लंबे समय तक विकलांगता और गंभीर बीमारियों से जूझते हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, ओड़िशा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल हैं। अब इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने नई तकनीक विकसित की है, जो न केवल इंसानों की जान बचाएगी बल्कि हर साल प्रयोगों में मारे जाने वाले हजारों जानवरों को भी मौत से बचाएगी।

पुरानी व्यवस्था पर सवाल

अभी तक भारत में एंटी-स्नेक वेनम इंजेक्शन की गुणवत्ता जांच के लिए ED50 टेस्ट किया जाता है। इस प्रक्रिया में हर फैक्ट्री में लगभग 3,700 चूहों का इस्तेमाल होता है। यह सौ साल पुराना तरीका महंगा, समय लेने वाला और जानवरों के लिए बेहद दर्दनाक है।

वैज्ञानिकों की नई खोज

हैदराबाद स्थित सीएसआईआर–सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के वैज्ञानिकों ने इन-विट्रो टेक्नोलॉजी विकसित की है। इस तकनीक से सांप के विष पर एंटी-वेनम की क्षमता सीधे लैब में जांची जा सकेगी। इससे न तो चूहों की बलि दी जाएगी और न ही जांच प्रक्रिया महंगी और लंबी होगी।

एम्स जोधपुर के डॉ. शुभम आनंद के अनुसार, “नई तकनीक से चूहों के इस्तेमाल को कम से कम 50 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है। इसके अलावा उत्पादन की लागत कम होगी और एंटी-वेनम दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों तक आसानी से पहुंचाया जा सकेगा।”

क्यों जरूरी है बदलाव

भारत में फिलहाल चार प्रमुख सांपों—इंडियन कोबरा, कॉमन करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर—के लिए पॉलीवैलेंट एंटी-वेनम तैयार किया जाता है। शोध में यह भी सामने आया है कि एक ही प्रजाति के सांप का विष अलग-अलग क्षेत्रों में अलग प्रभाव डालता है। ऐसे में नई तकनीक क्षेत्रीय विष की सटीक पहचान कर सकेगी और उसी अनुसार दवा की जांच भी की जा सकेगी।

वैश्विक स्तर पर असर

यह प्रयोग अभी शुरुआती चरण यानी टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 2 (TRL-2) पर है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य इसे TRL-6 तक ले जाकर औद्योगिक स्तर पर इस्तेमाल के लिए तैयार करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही इन-विट्रो टेस्टिंग को अपनाने की सिफारिश कर चुका है। ऐसे में अगर भारत का प्रयोग सफल हुआ तो यह न केवल देश बल्कि एशिया और अफ्रीका जैसे सांप प्रभावित क्षेत्रों में भी जीवन रक्षक साबित होगा।

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