अजीत पवार का जाना: फडणवीस सरकार के लिए खत्म हुई ‘साइलेंट स्ट्रेंथ’

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CENTRAL NEWS DESK: महाराष्ट्र की राजनीति में अजीत पवार का नाम कभी केवल एक पद या पार्टी तक सीमित नहीं रहा। वे सत्ता के भीतर उस संतुलन का प्रतीक थे, जो दिखता कम और महसूस ज्यादा होता था। विमान दुर्घटना में उनके असमय निधन ने न सिर्फ एक अनुभवी नेता को छीन लिया, बल्कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार से वह स्थिरता भी चली गई, जो बीते कुछ वर्षों से गठबंधन की रीढ़ बनी हुई थी।

सत्ता में अजीत पवार की भूमिका: दिखावे से दूर, असर गहरा

अजीत पवार की राजनीति का मूल स्वभाव सार्वजनिक मंचों से अधिक बंद कमरों में दिखाई देता था। वे न तो रोज बयानबाज़ी करते थे और न ही सरकार के भीतर शक्ति प्रदर्शन। इसके बावजूद, हर बड़े राजनीतिक फैसले में उनकी सहमति और संकेत को निर्णायक माना जाता था। यही वजह थी कि फडणवीस सरकार के भीतर वे एक ऐसे स्तंभ के रूप में देखे जाते थे, जो विवाद को जन्म लेने से पहले ही दबा देता था।

2019 का मोड़, जिसने भविष्य की राजनीति तय की

2019 के विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में जो राजनीतिक उथल-पुथल हुई, उसने अजीत पवार को सत्ता के केंद्र में ला खड़ा किया। राजभवन में सुबह-सुबह शपथ का दृश्य भले ही कुछ घंटों में इतिहास बन गया हो, लेकिन उसी घटना ने यह साबित कर दिया कि अजीत पवार जोखिम लेने वाले और सत्ता की दिशा बदलने की क्षमता रखने वाले नेता हैं। फडणवीस के लिए यह पहला संकेत था कि अजीत पवार केवल एनसीपी के नेता नहीं, बल्कि सत्ता प्रबंधन के माहिर खिलाड़ी हैं।

उद्धव सरकार में अलग-थलग, लेकिन प्रभावी

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार में अजीत पवार उपमुख्यमंत्री बने जरूर, लेकिन उनका और शिवसेना नेतृत्व का तालमेल कभी सहज नहीं रहा। नीति, फाइल मूवमेंट और प्रशासनिक निर्णयों में वे अक्सर अलग लाइन पर खड़े दिखाई दिए। यही अलगाव आगे चलकर उनके भाजपा के करीब आने का आधार बना।

2022 के बाद बदली सत्ता की धुरी

उद्धव सरकार गिरने के बाद फडणवीस ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर खुद उपमुख्यमंत्री का पद स्वीकार किया। यह कदम अस्थायी रणनीति था। फडणवीस जानते थे कि दीर्घकालीन राजनीति केवल शिंदे पर निर्भर रहकर नहीं चलाई जा सकती। इसी सोच के तहत अजीत पवार से संवाद लगातार चलता रहा। जुलाई 2023 में जब अजीत पवार ने शिंदे सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो सरकार को वह स्थायित्व मिला, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी।

संख्या से ज्यादा संदेश था अजीत पवार का साथ

एनसीपी (अजीत) के 41 विधायक केवल गणित नहीं थे। वे यह संदेश थे कि भाजपा के पास सत्ता बचाने के विकल्प मौजूद हैं। इससे न सिर्फ शिंदे गुट पर दबाव बना रहता था, बल्कि विपक्ष भी किसी बड़े राजनीतिक उलटफेर की उम्मीद नहीं कर पाता था।

2024 चुनाव और अजीत पवार की निर्णायक भूमिका

2024 के विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन के दौरान सबसे बड़ा तनाव मुख्यमंत्री पद को लेकर था। एकनाथ शिंदे की नाराज़गी खुलकर सामने आई। ऐसे समय में अजीत पवार ने सार्वजनिक तौर पर हल्के अंदाज़ में कही गई एक पंक्ति से पूरे राजनीतिक तनाव को समाप्त कर दिया। यही उनकी राजनीतिक समझ का परिचायक था—कम शब्द, बड़ा असर।

अब क्या कमजोर पड़ेगी सरकार?

अजीत पवार के जाने से सत्ता के भीतर वह संतुलन टूट गया है, जो टकराव को रोकता था। शिंदे की असंतुष्टि, विपक्ष की आक्रामकता और सहयोगी दलों की अपेक्षाएं—इन सबके बीच फडणवीस को अब अकेले ही राजनीतिक संतुलन साधना होगा।

फडणवीस के सामने नई चुनौती

अब सवाल यह नहीं कि सरकार गिर जाएगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सरकार पहले जैसी सहजता से चलेगी। अजीत पवार की जगह कोई और नेता उसी प्रभाव और स्वीकार्यता के साथ यह भूमिका निभा पाएगा, इस पर संशय है।

अजीत पवार का जाना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति में एक पूरे अध्याय का अंत है।

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