साल 2005: जब बिहार में दो बार हुए चुनाव और खत्म हुआ 15 साल का लालू राज
Bihar News Desk: बिहार की राजनीति के इतिहास में साल 2005 बेहद अहम माना जाता है। इसी साल राज्य में पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही वर्ष में दो-दो बार विधानसभा चुनाव कराने पड़े। यही वह समय था, जब लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के 15 साल लंबे शासन का अंत हुआ और नीतीश कुमार सत्ता के नए केंद्र बने।
15 साल का ‘लालू राज’ और बदलता बिहार
1990 के दशक की शुरुआत से लेकर 2005 तक बिहार की राजनीति पर लालू प्रसाद यादव और फिर राबड़ी देवी का दबदबा रहा। इस दौर को आम बोलचाल में “लालू राज” कहा जाने लगा। लेकिन 2005 आते-आते जनता बदलाव चाहती थी। इसी पृष्ठभूमि में राज्य की राजनीति ने करवट ली।

फरवरी 2005 का चुनाव और अधूरा जनादेश
फरवरी 2005 में विधानसभा चुनाव हुए।
- राबड़ी देवी की राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 75 सीटों पर सिमट गई।
- जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ा और 55 सीटें जीतीं।
- भाजपा ने 103 सीटों पर किस्मत आजमाई और 37 सीटों पर जीत मिली।
- कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, वह 84 में से सिर्फ 10 सीटों पर सिमट गई।
स्पष्ट बहुमत किसी भी दल को नहीं मिला। ऐसे में सरकार बनाने की कोशिशें असफल रहीं और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।
अक्टूबर-नवंबर 2005 का चुनाव और नीतीश की जीत
कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से चुनाव कराए गए।
- जदयू 139 सीटों पर चुनाव लड़कर 88 सीटें जीतते हुए सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
- भाजपा ने 102 में से 55 सीटें जीतीं।
- राजद 175 सीटों पर लड़ी लेकिन सिर्फ 54 पर जीत दर्ज कर पाई।
- लोजपा को 10 और कांग्रेस को मात्र 9 सीटों से संतोष करना पड़ा।

इस चुनाव ने बिहार की सियासत का नया अध्याय लिखा। जदयू और भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई और नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।
2005: बिहार की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट
साल 2005 को बिहार की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट कहा जाता है। इस चुनाव ने न केवल लालू प्रसाद यादव के लंबे शासन का अंत किया बल्कि बिहार को नीतीश कुमार के नेतृत्व में नई दिशा भी दी।
आज नीतीश कुमार 20 साल से सत्ता के केंद्र में हैं, जबकि लालू प्रसाद यादव का शासन इतिहास का हिस्सा बन चुका है।
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