कानपुर: मकान कब्जे पर बवाल, भाजपा नेता सर्वेश शुक्ला की पत्नी पर गंभीर आरोप

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Central News Desk: शहर के काकादेव क्षेत्र में मकान पर कब्जे की कोशिश को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि भाजपा नेता सर्वेश शुक्ला उर्फ बमबम की पत्नी और भाजपा महिला मोर्चा की निर्वतमान जिलाध्यक्ष सरोज सिंह समेत कई महिलाओं ने मिलकर एक परिवार के घर पर दबंगई दिखाई और जबरन कब्जा करने का प्रयास किया।

घटना कैसे शुरू हुई?

काकादेव की नेहरू–इंदिरा मलिन बस्ती में रहने वाली शकुंतला दीक्षित ने आरोप लगाया कि रविवार को भाजपा से जुड़े कुछ लोग उनके घर पहुंचे और दबाव बनाकर मकान पर कब्जा करने की कोशिश करने लगे। इस दौरान हंगामा और धक्का-मुक्की तक की नौबत आ गई।

पीड़िता ने बताया कि इस पूरे घटनाक्रम में काकादेव पुलिस मौके पर मौजूद रही, लेकिन उसने न तो हस्तक्षेप किया और न ही आरोपियों को रोकने की कोशिश की।

पहले से चल रहा विवाद

शकुंतला दीक्षित ने हाल ही में भाजपा नेता सर्वेश शुक्ला उर्फ बमबम पर रंगदारी मांगने का मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप है कि दबंगई और रंगदारी का यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा था और अब उसका नतीजा घर पर कब्जे की कोशिश के रूप में सामने आया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि पहले से सुलग रहे विवाद की परिणति है।

पुलिस की भूमिका पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। पीड़िता और स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरी कार्रवाई काकादेव पुलिस की मिलीभगत से हो रही है।
लोगों का कहना है कि अगर पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई करती, तो न तो घर पर कब्जे की कोशिश होती और न ही इतना बड़ा विवाद खड़ा होता।

राजनीतिक दबाव और जवाबदेही

यह मामला सिर्फ एक मकान विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक प्रभाव और दबंगई का चेहरा भी उजागर हुआ है।
भाजपा नेता के परिवार का नाम आने से मामला और गंभीर हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण ही आरोपी खुलेआम दबंगई दिखा रहे हैं।

पीड़िता की पीड़ा

शकुंतला दीक्षित ने मीडिया से कहा कि उन्हें न्याय की उम्मीद अब बेहद कमजोर लग रही है। उन्होंने मांग की है कि पुलिस-प्रशासन निष्पक्ष जांच करे और मकान कब्जे की कोशिश के पीछे की सच्चाई सामने लाए।

कानपुर में मकान कब्जे की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब आरोप सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं और उनके परिजनों पर लगते हैं, तो क्या पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई कर पाती है?
राजनीतिक दबाव, दबंगई और पुलिस की संलिप्तता—तीनों ने मिलकर इस मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है।

अब देखना होगा कि प्रशासन इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाता है और क्या पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं।

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