परमवीर चक्र: भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान की पूरी कहानी, और वो रेजिमेंट जिसे मिले सबसे ज्यादा वीरता चक्र

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CENTRAL DESK (Avneesh Mishra): परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है, जो केवल उन वीर सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने युद्ध के मैदान में दुश्मन के सामने असाधारण साहस, नेतृत्व और बलिदान का परिचय दिया हो। यह सम्मान सिर्फ पदक नहीं, बल्कि भारतीय सेना की उस परंपरा का प्रतीक है, जहां देश के लिए प्राणों की आहुति देना सर्वोच्च कर्तव्य माना जाता है। अब तक यह सम्मान बेहद सीमित बार दिया गया है, जो इसकी विशिष्टता को और भी बढ़ाता है।

26 जनवरी न सिर्फ इतिहास को याद करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह बताता है कि आज जो आज़ादी और संविधान हमें मिला है, उसके पीछे किन वीरों का खून और बलिदान छिपा है।

अब तक कितनी बार दिया गया परमवीर चक्र

स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक कुल 21 बार परमवीर चक्र प्रदान किया जा चुका है। इनमें से 14 सम्मान मरणोपरांत दिए गए, जबकि शेष उन सैनिकों को मिले जो युद्ध से जीवित लौटे। इन 21 पुरस्कारों में से 16 भारत-पाकिस्तान युद्धों से जुड़े हैं। यह तथ्य खुद बताता है कि यह सम्मान कितनी असाधारण परिस्थितियों में दिया जाता है। इनमें 20 विजेता भारतीय सेना से और एक भारतीय वायुसेना से रहा है।

कौन सी रेजिमेंट रही सबसे आगे

भारतीय सेना की प्रतिष्ठित द ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट को अब तक सबसे ज्यादा तीन परमवीर चक्र मिले हैं। यह रेजिमेंट अपने इतिहास, अनुशासन और युद्ध कौशल के लिए जानी जाती है। इसी रेजिमेंट के हवलदार अब्दुल हामिद ने 1965 के युद्ध में, मेजर होशियार सिंह दहिया ने 1971 के युद्ध में और मेजर योगेंद्र सिंह यादव ने 1999 के कारगिल युद्ध में परमवीर चक्र प्राप्त किया। इसके अलावा गोरखा राइफल्स की विभिन्न बटालियनों को भी यह सम्मान मिला है, जो भारतीय सेना की विविधता और वीरता को दर्शाता है।

1971 का युद्ध, जिसने इतिहास बदल दिया

साल 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध केवल दो देशों के बीच सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि इस युद्ध ने दक्षिण एशिया का भूगोल बदल दिया। इसी युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश अस्तित्व में आया। इस युद्ध के पश्चिमी मोर्चे पर लड़ी गई बसंतर की लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे निर्णायक लड़ाइयों में से एक मानी जाती है।

क्यों अहम था बसंतर और शकरगढ़ सेक्टर

शकरगढ़ सेक्टर पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित एक रणनीतिक इलाका था, जो भारत की ओर छुरी की तरह निकलता था। इसी इलाके से होकर पाकिस्तान आसानी से पठानकोट स्थित भारतीय सैन्य अड्डे पर हमला कर सकता था। अगर ऐसा होता तो जम्मू-कश्मीर और उत्तरी पंजाब का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से कट सकता था। इसी खतरे को खत्म करने के लिए भारतीय सेना ने इस इलाके पर कब्जा करने का फैसला किया।

टैंकों और बारूदी सुरंगों के बीच जंग

भारतीय सेना को आदेश मिला कि बसंतर नदी पार कर दुश्मन इलाके में ब्रिजहेड बनाया जाए, ताकि टैंक आगे बढ़ सकें। पाकिस्तानी सेना ने पूरे क्षेत्र में बारूदी सुरंगें बिछा रखी थीं और भारी तोपखाने के साथ टैंक तैनात किए थे। जैसे ही भारतीय इंजीनियर्स ने रास्ता साफ करना शुरू किया, पाकिस्तानी तोपों ने हमला बोल दिया। इसी के साथ बसंतर के टैंक युद्ध की शुरुआत हुई।

घायल होकर भी मोर्चे पर डटे मेजर होशियार सिंह

इसी युद्ध में 3 ग्रेनेडियर्स की कमान संभाल रहे मेजर होशियार सिंह दहिया ने ऐसी बहादुरी दिखाई, जिसने उन्हें अमर बना दिया। 16 और 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने लगातार टैंक और पैदल सेना के हमले किए। इस दौरान मेजर होशियार सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। वह एक खाई से दूसरी खाई तक जाते रहे, अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे और उन्हें डटे रहने के लिए प्रेरित करते रहे।

जब उनके गनर शहीद हो गए तो मेजर होशियार सिंह ने खुद मशीनगन संभाल ली और दुश्मन पर फायरिंग शुरू कर दी। उनका यह साहस देखकर पूरी यूनिट में नया जोश भर गया और भारतीय सैनिकों ने दुश्मन पर जबरदस्त पलटवार किया।

दुश्मन की कमर टूट गई

मेजर होशियार सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने दर्जनों पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट कर दिया और सैकड़ों दुश्मन सैनिक मारे गए। पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वह इस इलाके से पीछे हटने पर मजबूर हो गई। इसी जीत ने पश्चिमी मोर्चे पर भारत की स्थिति मजबूत कर दी।

युद्ध के बाद भी दिखाई गई इंसानियत

लड़ाई खत्म होने के बाद भारतीय सेना ने दुश्मन सैनिकों के साथ भी इंसानियत का परिचय दिया। पाकिस्तानी कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल अकरम राजा के पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ सौंपा गया। उनके ताबूत में एक चिट्ठी रखी गई, जिसमें एक सैनिक द्वारा दूसरे सैनिक को दी गई श्रद्धांजलि दर्ज थी। बाद में पाकिस्तान ने भी उन्हें अपना बड़ा सैन्य सम्मान प्रदान किया।

परमवीर चक्र और अमर विरासत

बसंतर की लड़ाई में दिखाए गए अद्वितीय साहस और नेतृत्व के लिए मेजर होशियार सिंह दहिया को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा सैनिक हालात से नहीं डरता, बल्कि अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखता है।

परमवीर चक्र सिर्फ एक पदक नहीं है, यह उस सोच का प्रतीक है जिसमें देश सर्वोपरि होता है। मेजर होशियार सिंह दहिया और उनके जैसे वीरों की कहानियां आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी।

भारत के परमवीर चक्र सम्मानित वीर जवान

भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र अब तक कुल 21 वीर सैनिकों को प्रदान किया गया है। यह सम्मान अद्वितीय साहस, बलिदान और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च कर्तव्य के लिए दिया जाता है।

मेजर सोमनाथ शर्मा, नायक जदुनाथ सिंह, कंपनी क्वार्टरमास्टर हवलदार अब्दुल हामिद, लांस नायक करम सिंह, कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया, स्क्वाड्रन लीडर अज्जामादा बोप्पय्या देवय्या, मेजर शैतान सिंह, सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, मेजर होशियार सिंह दहिया, कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह, लांस नायक अल्बर्ट एक्का, सुबेदार जोगिंदर सिंह, नायब सुबेदार चुनी लाल, राइफलमैन संजय कुमार, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, कैप्टन मनोज कुमार पांडेय, कैप्टन विक्रम बत्रा, राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, सुबेदार बाना सिंह, फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों, लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे

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